युवाचार्य श्रीश्यामशरण देव जी महाराज


युवराज श्रीश्यामशरणदेव :

पूज्य श्रीनिम्बार्काचार्यपीठाधीश्वर श्री श्रीजी महाराज के परमस्नेह भाजन आचार्यपीठ के भावी उत्तराधिकारी, श्रीनिम्बार्क सम्प्रदायैकनिष्ठ समस्त भक्तवृन्द के परम प्रिय युवराज श्रीश्यामशरणदेव का जन्म निम्बार्कतीर्थ-सलेमाबाद में वैद्यप्रवर श्रीबालमुकुन्दजी शर्मा के निवास स्थान पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सन्तोषदेवी के पावन कुक्षि से भाद्रपद षष्ठी (बलदेव छठ) वि0 सं0 2043 तदनुसार 9 ​सितम्बर 1986 को हुआ। श्रीकान्त इस संज्ञा से आपका शैशव आभूषित हुआ। माता-पिता को अपने बाल्यक्रीडा से हर्षित करते हुये प्रतिपच्चन्द्र के समान प्रतिक्षण वृद्धि को प्राप्त करते हुये शैशवकाल व्यतीत होता रहा। नवगत शिशु की कमनीयता व उसको दीप्ति से प्रथम ही परिलक्षित होता था, कि यह शिशु सामान्य नहीं सविशेष लक्षणों से युक्त है। अवश्य परिवार तक सीमित न रहते हुये एक दिन यह बालक महत्वपूर्ण पदवी को प्राप्त करेगा। यह भी विशेष है कि जन्म-जन्मान्तर कृत पुण्य संचय का फल, उन धर्मात्मा दम्पती को प्राप्त होता है, जिनके घर ऐसे शिशु जन्म लेते हैं। एतदर्थ निम्बार्कतीर्थ का वह इन्दौरिया गौड़ वंशावतंश विप्रदम्पती भी परम धन्य है। जिनके घर ऐसे सन्तति ने जन्म प्राप्त किया। चपल बाललीलाभिरत श्रीकान्त ने शनै: शनै: शैशवावस्था से बाल्यकाल प्राप्त किया उनकी निम्बार्कतीर्थ में विचरण करते हुये मन्दिर में भगवद् दर्शन व भगवत् प्रसाद में विशेष अभिरुचि रहती थी। आचार्यपीठ में अनन्त श्रीविभूषित जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्यपीठाधीश्वर श्री श्रीजी महाराज के पीठाभिषिक्त हुये पचास वर्ष के उपलक्ष्य में स्वर्ण जयन्ती महोत्सव, अ0 भा0 विराट् सनातन धर्म सम्मेलन के साथ मनाया जा रहा था। इस अवसर पर भारतवर्ष के समस्त धर्माचार्यों की गरिमामयी उप​स्थिति ने अ0 भा0 श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ को अत्यधिक गौरवान्वित किया। उस वेला पर सुसज्जित मंच पर विराजित समस्त धर्माचार्यों का दर्शन लाभ प्राप्त कर ऐसा लगता था कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक श्रीसर्वेश्वर प्रभु इन आचार्यस्वरूप से दर्शन देकर उस समय पाण्डाल में समुप​स्थित अपार भक्तवृन्दों को कृतार्थ कर रहे हों। ऐसी शुभवेला में समस्त धर्माचार्यों की महती सन्निधि में दि0 23-5-1993 रविवार वि0 सं0 2050 को बालक श्रीकान्त का सप्तवर्षदेशिक स्वल्पवय में ही आचार्यश्री तथा समस्त पीठ परिकर एवं भक्तवृन्दों की मंगलमयी भावनानुसार आचार्यपीठ के भावी उत्तराधिकारी के रूप में शतश: विप्रों द्वारा वैदिक भद्रसूक्त के उद्घोष के साथ तीर्थजल द्वारा अभ्षिक्ति किया गया। भक्तजनों के जयघोष द्वारा निम्बार्कतीर्थ परिसर को गुंजायमान कर दिया। सप्तवर्षदेशिक श्रीकान्त स्वकुलतिलक के साथ आज श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ परम्पराश्रित होकर युवराज श्रीश्यामशरणदेव बन गये। श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय ​सिद्धान्तानुरूप बालब्रह्मचारी ही इस पद पर प्रतिष्ठित होते हैं। तत्पश्चात् उन्हें शिक्षा दीक्षा प्रदान की जाती है। एतदर्थ दि05-5-1995 के पावन दिवस पर पूज्य आचार्यश्री द्वारा विरक्त दीक्षा ग्रहण कर आचार्यपीठ में विशिष्ट विद्वद्ज्जनों द्वारा आपकी शिक्षा भी सुचारु सम्पन्न होती रही। आप अपने सुमधुर प्रवचन द्वारा सनातन धर्म के प्रचार में प्रयत्नशील हैं। आपकी प्रांजल भाषा श्रवणीय है। आप व्याकरण शास्त्र विषय से सम्प्रति आचार्य की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। आधुनिक भाषा अंग्रेजी इत्यादि में भी आप प्रवीण है। शिक्षा इतर संगीत का भी आपने पूज्य आचार्यश्री द्वारा ज्ञान प्राप्त किया है। इसके फलस्वरूप ही युवराज श्रीश्यामशरणदेव विविध कला में पारंगत है।