युगलोपासना


युगलोपासना :-
भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य के अनुसार ‘रस‘ या आनन्द ब्र का ही पर्याय है, जो श्रुति द्वारा ‘रसो वै स:‘ के रूप में प्रतिपादित किया गया है। श्रीनिम्बार्क ने अपने भाष्य में ‘रस-तत्व‘ या परमात्मतत्व के अखण्ड आनन्दमयता की स्पष्ट घोषणा की हैं। उनकी मान्यता के अनुसार इस आनन्दमयता का सम्बन्ध जीव से नहीं, अपितु ब्र से हैं-
आनन्दमय: परमात्मा न तु जीव: कुत ? परमात्म विषयकानन्दपदाभ्यासात्‌।
‘रसं ेवायं लब्धाघ्नन्दी भवति‘ इति वाक्येन लब्धव्ययोर्भेदव्यपदोच जीवोज्ञानानन्दमय:।
इन सूत्रों द्वारा ब्र में आनन्द की अनन्तता की पुष्टि की गई है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि ‘रस‘ आनन्द ब्र का स्वरूपतात्मक धर्म होते हुए भी चित्‌ या ज्ञान के द्वारा वह आस्वादयनीय है। रस-ब्र का अनुभव ही ‘भगवल्लीला‘ है। वस्तुत: परात्पर भगवान्‌ श्रीकृष्ण और उनकी परमाह्‌लादिनी शक्ति श्रीराधा ही इस ‘भगवल्लीला-रस‘ अथवा माधुर्य-रस के केन्द्र है। श्रीनिम्बार्काचार्य ने इन्हीं युगलकााेिर की उपासना में अपने माधुर्य-भाव का पुट दिया है। पुराणों में श्रीराधाकृष्ण के लीलामय स्वरूप को शक्ति और शक्तिमान्‌ के रूप में स्वीकार किया गया है। वे ‘एक प्राण द्वै देही‘ है। श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ आत्मा-आत्माराम एवं बिम्बप्रतिबिम्ब भाव की झॉंकी स्पष्ट की गई है-
‘‘रेमे रमेााे व्रज-सुंदरीभिर्यथार्भक: स्वप्रतिबिम्ब-विभ्रम:।
आत्मा तु राधिका तस्य तयैव रमणादसौ! आत्माराम इति प्रोक्तो मुनिभिर्गूढवेदिभि:।।
श्रीराधाकृष्ण को उपास्य मानकर चलने वाली धारा में निम्बार्कीय, गौड़ीय, वल्लभीय एवं राधावल्लभीय से चार धाराएॅं ऐसी है, जो माधुर्य-भाव की साधना अथवा रसिक साधना में आस्था रखती है। पूर्ववर्ती समस्त वैष्णव सम्प्रदायों में श्रीकृष्ण की माधुर्य-उपासना का सबसे प्राचीन प्रचारक निम्बार्क-सम्प्रदाय हैं। यद्यपि श्रीनिम्बार्काचार्य के आविर्भाव-काल में पर्याप्त मतभेद है, तथापि उच्चकोटि कि विद्वान्‌ निम्बार्क सम्प्रदाय की प्राचीनता को एकमत से स्वीकार करते हैं। इस सम्प्रदाय के उद्गम पर विचार करने से भी ऐसे अकाट्‌य तर्क प्राप्त होते हैं, जिसे निम्बार्क-सम्प्रदाय की प्राचीनता स्वीकार करने में सन्देह की कोई गुंजाइा नहीं रह जाती। यह भी स्पष्ट रूप से सर्वमान्य है कि श्रीकृष्ण की माधुर्य-उपासना का श्रेय: भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य को ही है। उनके सिद्धान्त ग्रन्थों से इस तथ्य की पूर्णरूपेण पुष्टि हो जाती है। श्रुतियों ने जिस रसोपासना की ओर इंगित किया है, वह रसरूप परमात्मा श्रीकृष्ण ही है। उन्हीं की उपासना से जीवों को परम-सुख की उपलब्धि हो सकती है। इस उद्देय को दृष्टि में रखते हुए सुर्दानावतार श्रीनिम्बार्क ने श्रीराधाकृष्ण की माधुर्योपासना पर वाेिष बल दिया है। श्रीकृष्ण के चरणों की शरण लिए बिना कल्याण नहीं हो सकता। अस्तु, जीव की एकमात्र गति पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही है। साथ ही उनके वामांग में विराजतमान उन्हीं के समान अनुपम लावण्य से युक्त तथा सहस्त्रों सखियों से परिसेवित सर्वेवरी श्रीराधा की आराधना करना परम आवयक है। वे अपनी ‘दालोकी‘ में स्पष्ट घोषणा करते हैं-
अंग तु वामे वृषभानुजां मुदा विराजमानामनुरूप -सौभगाम्‌।
स्खी-सहस्रै परिसेवितां सदा, स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम्‌।।
श्रीनिम्बार्काचार्य के उपास्य तत्व की परमोत्कृष्टता इसी स्वरूप में निहित है। श्रीराधा श्रीकृष्ण के वामांग में सर्वदा ही विराजमान रहती है। अर्थवेदीय राधिकातापनीयोपनिषद् में तो यहॉं तक कहा गया है कि बिना सखी भाव का अवलम्ब लिए कोई भी साधक इस दिव्य-माधुर्य का आस्वादन नहीं कर सकता और यह भाव बिना सर्वेवरी श्रीराधाजी कर कृपा के किसी को प्राप्त नहीं होता। सम्पूर्ण-भुवन की ओर सहज में ही आकृष्ट करने वाले पूर्णपुरुषोत्तम श्रीकृष्ण इन्हें अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते हुए प्रेमार्द्र होकर उनकी चरण-रज को ारोधार्य करने के लिए सदैव लालायित रहते है। जिन राधाजी के वाीभूत परात्पर भगवान्‌ श्रीकृष्ण रहते हैं, उन्हीं की उपासना का सन्दो प्रियतमभाव से श्रुतियों ने दिया है। वस्तुत: श्रीराधाकृष्ण रस के सार-समुद्र एक ही देहााही हैं, क्रीड़ा करने के लिए ही दो हुए है। उनका यह अंग-अंगी सम्बन्ध द्वैताद्वैतभाव का भी पोषक है-
येयं राधा यच कृष्णो रसाब्धि: देहचैक: क्रीड़ानार्थ द्विधाभूत्‌।
श्रीनिम्बार्काचार्य ने ऐवर्यप्रधान भ्क्ति के स्थान पर माधुर्यप्रधान भक्ति की ाक्षा दी है। उनकी दृष्टि में भगवान्‌ श्रीकृष्ण के ऐवर्यमर्य रूप की ओर आकृष्ट होना तो भक्ति का नहीं, अपितु धर्म-साधना का आरम्भ मात्र है। भक्ति की सर्वोत्कृष्टता एवं सच्ची उपासना तो उसके जीवन्त साहचर्य एवं प्रेम में बंधकर उनके माधुर्यमय रूप का आस्वादन करना हैं। इस माधुर्य भाव की प्राप्ति बिना सर्वेवरी राधा की कृपा के सम्भव नहीं। अत: निम्बार्काचार्य ने ‘अंगे तु वामे‘ कहकर सर्वप्रथम श्रीराधिका कााेिरी जू का स्मरण श्रीकृष्ण के साथ कर उनकी कृपा की याचना की है। वे कहते हैं-‘हे राधे ! तुमने पतंग की भॉंति अपने पीछे दौड़ते हुए मुकुन्द को अपने प्रेम रूपी डोरे से बॉंध दिया है। श्रीकृष्ण तुम्हारे साथ क्रीड़ा करते हुए सर्वदा विद्यमान रहते हैं-
मुकुन्दस्त्वया प्रेमडोरेण बद्ध: पंतगो यथा त्वामनुभ्राम्यमाण:।
उपक्रीडयन्‌ हार्द्दमेवानुच्छन्‌ कृपा वर्तते कारयतो मयीष्टिम्‌।।
इस प्रकार अपने प्रियतम के प्रेम से प्रफुल्लित अंगों वाली शरीर में स्वेदबिन्दुओं से युक्त, प्रेम-पीयूष की वृष्टि करने वाली तथा कृपाकटाक्ष से देखने वाली रासेवरी श्रीराधिका की आराधना किये बिना इस माधुर्य की प्राप्ति असम्भव हैं। श्रीराधाष्टक स्तोत्र के अन्तिम श्लोक में उन्होंने इस बात की पुष्टि की है कि दामोदर की परमप्रिया श्रीराधका के इस अष्टक के सहारे ही साधक अपनी साधना के क्षेत्र में ततपर होकर सखीभाव से ही उन युगल के आनन्द का रसास्वादन कर सकता है-
इदं त्वष्टकं राधिकाया: प्रियाया: पठेयु: सदैवं हि दामोदरस्य।
सुतिष्ठान्ति वृन्दावने कृष्णधम्नि सखीमूर्तयो युग्मसेवानुकूला:।।
‘‘प्रातर्नमामि वृषभानुसुतापदाब्जं‘‘ कहकर श्रीनिम्बार्काचार्य वृषभानुनन्दिनी श्रीराधिका कााेिरीजू के चरणारविन्दों की प्रात:कालीन वन्दना करते हुए दिखाई देते हैं। वे अपने ‘प्रात:स्मरण स्तोत्र‘ में कहते हैं-‘शयन से उठे हुए, युगलरूप् सर्वेवर, सुखकारी, रसिकेवर, परस्पर केलिरस के चाेिं से चमत्कृत, सखियों से परिसेवित, सुरत काम से शोभायमान, सुरत-सार समुद्र के चाेिं को अपने कपोल तथा नेत्रों पर धारण करने वाले, रति आदि समस्त प्रकार के अलौकिकानन्द को प्रदान करने वाले, दिव्यतम से युक्त, पुण्यपुंज श्रीराधाकृष्ण का मैं प्रात:स्मरण करता हूॅं-
प्रातर्भजामि शयनोथित-युग्मरूपं, सर्वेवरं सुखकरं रसिकोभूपम्‌।
अन्योय-केलिरस- चाि-चमत्कृपागंम्‌ सख्यावृतं सुरत-काममनोहरं च।।
प्रातर्भजे सुरतसार-पयोधि चाि गण्डस्थलेन नयनेन सन्दधानौ।
रत्याद्योष-ाुभदौ समुपेत-कामौ, श्रीराधिकावर-पुरन्दर-पुण्य-पुंजौ।।
उक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि श्रीनिम्बार्काचार्य ने अपनी प्रत्यक्ष माधुर्योपासना का स्पष्ट सन्दो स्वरचित ग्रन्थों में दिया हैैं। श्रीनिम्बार्क पूर्व वैष्णव सम्प्रदायों में इस प्रकार सन्दो प्राप्त नहीं होता। उनकी इस माधुर्योपासना का पूरा-पूरा प्रभाव परवर्ती समस्त वैष्णव सम्प्रदायों पर पड़ा हैं, जिनके फलस्वरूप व्रज-वृन्दावन में आज भी माधुर्य भ्क्ति में ओत-प्रोत रसमयी-मन्दाकिनी प्रवाहित होती दिखाई देती है।
श्रीनिम्बार्काचार्य के उपरान्त उनके परम्परानुयायी जिन ाष्य-प्राष्य ने उनके द्वारा आरोपित रासोपासना के पादप को पल्लवित और पुष्पित किया उनमें श्रीऔदुम्बराचार्य और श्रीनिवासाचार्य प्रमुख है। तत्पचात इस परम्परा में रसमय भावभक्ति की वृद्धि होती गई जो 14 और 15 वीं शताब्दी में श्रीभट्‌टदेवाचार्य और उनके पटृटाष्य महावाणीकार श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी के वाणी साहित्य में स्पष्ट रूप से पाई जाती है।
युगलातककार श्रीभट्‌टदेवाचार्यजी माधुर्योपासना के ऐसे अमृतानन्दघन हुए, जिन्होंने अपनी अलौकिक रसवृष्टि द्वारा रसिकों के मन-मयूरों को मत्त बना दिया। युगलातक का रचनाकाल वि0 सं0 1352 निर्धारित है। श्रीभट्‌टदेवाचार्य, श्रीकोवकामीरिभट्‌टाचार्य के प्रिय ाष्य थे। निम्बार्क सम्प्रदाय के आचार्य का यह रसिक रूप इतना विख्यात हुआ कि भक्तमालकार श्रीनाभादास को लिखना पड़ा--
मधुर भाव सम्मिलित ललित लीला सुवलित छवि। निरखत हरषित दयप्रेम वरषत सुकलित कवि।
आनन्दकन्द श्रीनन्दसुवन श्रीवृषभानुसुता भजन। श्रीभट्‌ट सुभट्‌ट प्रगटयो अघट रसरसिकन मनमोदघन।।
जो नाभादासजी ने ‘रस-रसिकन मन मोदघन‘ इन शब्दों में यह संकेत किया है कि श्रीयुगलकााेिर की मधुर लीलाओं का व्रजभाषा में वर्णन करने वाले रचयिताओं में श्रीभट्‌टजी ही प्रथम रचयिता हैं। श्रीभट्‌ट कृत ‘युगलातक‘ में रूपमाधर्य, केलिमाधुर्य, रतिमाधुर्य आदि के नित्यविहार निकुंजलीला सम्बन्धी पद प्राप्त होते हैं, तो माधुर्य-भक्ति से परिप्लावित हैं। श्रीयामायाम के अंग-प्रत्यंगों की आनन्दात्मक रसमाधुरी का पान करते हुए श्रीभट्‌टजी के नेत्र चकोरवत्‌ दृषित करके पलक मारना भी भूल जाते हैं--
बसौ मेरे नैनन में दोउ चंद।
गौर वरन वृषभानुनंदिनी स्याम वरन नन्दनन्द।।
गोलक रहे लुभाय रूपमें निरखत आनन्दकन्द।
जै श्रीभट्‌ट प्रेमरस बंधन क्यों छूटैं दृढ़ फंद।।
निम्बार्क सम्प्रदायान्तर्गत श्रीभट्‌टजी को ‘हितूसखी‘ का अवतार माना जाता है। युगलातक के एक टीकाकार बरसानावासी लडैंतीदास ने लिखा है--
श्रीभट्‌ट है हितू सहचरी, प्रगट कियौ श्रृंगार। जुगल सत विख्यात है, रसिकन कौ आधार।।
श्रीभट्‌टजी ने युगलातक के छहों प्रकरण:सिद्धान्तसुख, व्रजलीला, सेवासुख, सहजसुख, सुरतसुख और उत्साहसुख में श्रीराधामाधव की मधुर-रसमयी लीलाओं का सखीभाव से ही गान किया है। श्रीनिम्बार्काचार्य की भॉंति उन्होंने श्रीराधा की उपासना को ही प्रधानता दी है, जिनके चरणों को प्रियतम श्यामसुन्दर भी सदा ‘पलोटते रहते हैं और उनका संवाहन कर स्वयं को कृतकार्य मानते हैं
प्यारीजू के चरण पलोट मोहन।
न्ली कमल के दलन लपेटे, अरून कमलदल सोहन।।
कबहुॅंक लै लै नैन लगावत, अलि धावल मानो मोहन।
जै श्रीभट्‌ट छबीली राधे, होत जगे तें छोहन।।
श्रीभट्‌टदेवजी के प्रधान ाष्य अनन्य रसिक श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी का प्रादुर्भाव वि0 सं0 1460 में माना जाता हैं। आदि व्रजभाषा वाणी युगलातक के रूप में जिन सरस रसोपासना के सूत्रों की रचना श्रीभट्‌टजी ने की, उसी का उत्कृष्ट रसमय मधुर महाभाष्य उनके ाष्य श्रीहरिव्यासदेवजी ने अपने ‘महावाणी‘ नामक ग्रन्थ में किया है। ‘महावाणी‘ में शुद्ध नित्यविहार रस से संवलित उज्जवल रस की उपासना पद्धति मधुर रसभीने उत्कृष्ट भाव सरस प्रांजल भाषा में व्यक्त है, जिनके कारण यह ग्रन्थ रसिकजनों का कण्ठाभरण बना हुआ है। महावाणी नामक ग्रन्थ में किया है।