दर्शनीय उत्सव-महोत्सव


दर्शनीय उत्सव-महोत्सव :-
श्रीनिम्बार्क- संप्रदाय में व्रत एवं महोत्सव कपालवेध मतानुसार आयोजित किये जाते है। श्रीसुदर्शनचक्रावतार श्रीभगवम्बिार्काचार्य जी ने भगवत्-भागवत जयन्तियों में तिथि का उदयकाल अद्‍​र्धरात्रि घटी पर ही माना है, इसी का नाम स्पर्श (कपाल) वेध है। तात्पर्य यह है कि घटी के बाद दशमी हो तो वह आगामी तिथि को स्पर्श कर लेती है। अत: इसका नाम स्पर्श वेध और अद्‍​र्धभाग का नाम है कपाल इसलिये रात्रि के अद्‍​र्धभाग को कपालवेध कहते है। कपालवेध मतानुसार एकादशी शुद्ध और दूसरे दिन आठ महाद्वादशी में मे से कोई महाद्वादशी हो तो एकादशी व महाद्वादशी दोनों ही व्रत करें, यदि दो दिन व्रत न कर सकें तो एकादशी व्रत का त्याग किया जा सकता है किन्तु महाद्वादशी व्रत का त्याग न करें इसका व्रत अवश्य करें। ऐसा शास्त्रीय विधान है।
विशेष :- आठ महाद्वादशी जया, विजया, जयन्ती, पापनाशिनी, उन्मीलिनी, वंजुलिनी, त्रिस्पृशा और पक्षवर्धिनी ये आठ महाद्वादशी है। इनका योग इस प्रकार बनता है, जैसे किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त हो तो जया, रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो जयन्ती, पुष्य नक्षत्र से युक्त हो तो पापनाशिनी तथा श्रवण नक्षत्र से युक्त हो तो चाहे शुक्ल पक्ष हो अथवा कृष्ण पक्ष हो वह विजया नामक महाद्वादशी कहलाती है। इसी प्रकार एकादशी पूर्ण हो और दूसरे दिन भी कुछ एकादशी हो तो वह द्वादशी उन्मीलिन कहलाती है और यदि एकादशी और द्वादशी सम्पूर्ण हो और फिर त्रयोदशी को भी कुछ अवशिष्ट हो तो वह द्वादशी वंजुलिनी महाद्वादशी कहलाती है। द्वादशी का क्षय होकर रात्रि शेष में त्रयोदशी हो तो वह त्रिस्पृशा तथा अमावस्या व पूर्णिमा दो हो जाये तो वह पक्षवर्धिनी कहलाती है। इनका योग आ जाने पर दोनों सम्भव न हो तो शुद्धा एकादशी को छोड़कर महाद्वादशी में ही व्रत करना चाहिये, ऐसी शास्त्रों की आज्ञा है।
एकादशी भवेत्पूर्णा परतो द्वादशी भवेत्।
तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत्।। स्कन्दपुराण।।
भावार्थ :- एकादशी पूर्ण हो अर्थात् पूर्व तिथि दशमी विद्धा न हो और अग्रिम तिथि द्वादशी महाद्वादशी के रूप में हो तब ऐसी अवस्था में एकादशी तिथि में एकादशी व्रत को त्याग कर महाद्वादशी के दिन ही व्रत करना चाहिये। यह शास्त्रीय विधान है।
वैष्णव धर्म सुरद्‍​र्रुम मञ्जरी के आचार तिलके पृष्ठ पर अंकित श्लोक के अनुसार -
पर्वाच्युतजयावृद्धौ, ईशदुर्गान्तकक्षये।
शुद्धाप्येकादशी त्याजा द्वादश्यां समुपोषणम्।। ब्रह्मवैवर्त पुराण।।
भावार्थ :- पर्व (पूर्णिमा, अमावस्या) अच्युत (द्वादशी) जया (त्रयोदशी) की वृद्धि हो और ईश (अष्टमी) दुर्गा (नवमी) अन्तक (दशमी) इनमें से किसी एक का क्षय हो तो शुद्धा एकादशी को छोड़कर द्वादशी में व्रत करें। इस प्रकार कपालवेध मतानुसार आचार्य पीठ में व्रत एवं महोत्सवों का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (एकम्) नववर्षारम्भ (नवरात्र) से होता है।
1.नववर्षारम्भ :- आचार्य पीठ में यह उत्सव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (एकम्) को मनाया जाता है। इस दिन प्रात: ही मुख्य मन्दिर में आम, जामुन आदि पत्तों से तैयार बान्दनवार मन्दिर में जगह-जगह बाँधी जाती है तथा नौ दिन तक चलने वाले नवरात्र महोत्सव हेतु भगवान् राम के स्वरूप की स्थापना की जाती है। जहाँ पर विधि-विधान से ब्राह्मणों द्वारा नौ दिन तक पूजन किया जाता है। यह महोत्सव राम नवमी के दिन समाप्त होता है।
2.रामनवमी :- आचार्य पीठ में यह उत्सव चैत्र शुक्ल नवमी को मनाया जाता है। नवरात्र महोत्सव के अन्तिम दिवस आचार्य पीठ में रामनवमी महोत्सव उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्रीराधा-माधव प्रभु का भगवान् श्रीराम के रूप में विशेष श्रृंगार किया जाता है अर्थात् श्रीमाधव प्रभु का भगवान् श्रीराम के स्वरूप में ही श्रृंगार कर हाथ में धनुष धारण कराया जाता है। इसी प्रकार श्रीराधा रानी जी का श्रृंगार सीताजी के स्वरूप में किया जाता है। यह दिन भक्तों के लिये विशेष होता है क्योंकि इस दिन एक ही स्वरूप में श्रीराधाकृष्ण एवं श्रीसीताराम के दर्शन होते है। ऐसे अलौकिक दर्शन केवल अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ में ही होते है।
3. श्रीराधासर्वेश्वरशरण देवाचार्य जी महाराज का शुभजन्मोत्सव :- वर्तमान पीठाधीश्वर श्रीराधासर्वेश्वरशरण देवाचार्य जी श्री ’’श्रीजी’’ महाराज का शुभजन्मोत्सव वैशाख शुक्ल प्रतिपदा (एकम्) को आचार्य पीठ में बड़े ही उल्लास एवं उमंग के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्री ’’श्रीजी’’ महाराज अपने पूर्वाचार्यों के चित्रपट्टों पर पुष्प अर्पित कर उनका पूजन करते हैं । इसके पश्चात युवराज जी तथा मन्दिर के परिकरों के द्वारा श्री ’’श्रीजी’’ महाराज का पूजन किया जाता है। तत्पश्चात बाहर से पधारे हुये भक्तों के द्वारा श्री ’’श्रीजी’’ महाराज का पूजन किया जाता है।
4.अक्षय तृतीया :- आचार्य पीठ में यह उत्सव वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीराधामाधव का नख से शिख तक चन्दन से श्रृंगार किया जाता है। वैशाख मास में गरमी का मौसम होने के कारण श्रीराधा-माधव के मौसमानुकूल फल, सत्तू एवं शीतल पदार्थ समर्पित किये जाते हैं । प्रभु के चन्दन से श्रृंगारित दर्शन कर तन-मन में शीतलता व्याप्त हो जाती है। अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान् श्रीपरशुरामजी का जन्म हुआ था। इसलिये आचार्य पीठ में इसी दिन भगवान् श्रीपरशुरामजी की जयन्ती भी मनाई जाती है।
5.श्रीनृ​सिंह जयन्ती :- भगवान् श्रीनृ​सिंह का प्राकट्य उत्सव वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। श्रीनृ​सिंह जयन्ती के दिन श्रीनिम्बार्काचार्यपीठस्थ श्रीराधा-माधव भगवान् का भगवान् श्रीनृ​सिंह के रूप में विशेष श्रृंगार किया जाता है। श्रीराधामाधव भगवान् का श्रीनृ​सिंह रूप के अनुकूल वस्त्रादि धारण करवाये जाते है। इसके बाद गायकों के द्वारा प्रभु के पदों का गायन किया जाता है।
6.श्रीराधासर्वेश्वरशरण देवाचार्य जी महाराज का पाटोत्सव :- वर्तमान श्रीनिम्बार्काचार्यपीठाधीश्वर श्रीराधासर्वेश्वरशरण देवाचार्य जी श्री ’’श्रीजी’’ महाराज का पाटोत्सव ज्येष्ठ शुक्ला द्वितीया को मनाया जाता है। इस दिन श्री ’’श्रीजी’’ महाराज अपने पूर्वाचार्यों के चित्रपट्टों पर पुष्प अर्पित कर उनका पूजन करते हैं। भगवान् श्रीराधा-माधव का विशेष श्रृंगार किया जाता है। इस अवसर पर उप​स्थित भक्तों को श्री ’’श्रीजी’’ महाराज द्वारा आशीर्वाद प्रदान किया जाता है।
7.श्रीराधा-माधव भगवान् का पाटोेत्सव :- श्रीनिम्बार्काचार्यपीठस्थ श्रीराधामाधव भगवान् का पाटोत्सव ज्येष्ठ शुक्ला दशमी (गंगा दशहरा) को मनाया जाता है। इस दिन श्रीनिम्बार्काचार्यपीठस्थ श्रीराधामाधव भगवान् का पञ्चामृताभिषेक करने के पश्चात् प्रभु को विशेष नैवेद्य अर्पित किये जाते है। इसके उपरान्त मनोहर फूल-बंगले के दर्शन आयोजित किये जाते है। इसी दिन मदनगंज-किशनगढ़ ​स्थित श्रीराधा-सर्वेश्वर भगवान् का पाटोत्सव भी मनाया जाता है।
8.रथयात्रा महोत्सव :- रथयात्रा महोत्सव आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की द्वितीया को आाचर्य पीठ में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन दो काष्ठ निर्मित रथों को गोटे एवं फूलों से सुसज्जित कर उनमें से एक रथ में श्री गोकुल चँद्रमा जी एवं दूसरे रथ में श्रीसर्वेश्वर प्रभु के श्रीविग्रह को विराजमान किया जाता है, क्योंकि श्रीराधामाधव जी का श्रीविग्रह अविचल होने के कारण उन्हें रथ में विराजमान नहीं किया जा सकता हैं। इसके पश्चात स्वयं श्री ’’श्रीजी’’ महाराज द्वारा जगमोहन में रथों का अनुपम द्रुतगति परिचालन किया जाता हैं। इस अवसर पर श्रीसर्वेश्वर प्रभु का पंचामृताभिषेेक किया जाता हैं। तथा गायकों द्वारा प्रभु के पदों का गायन एवं स्तुति की जाती हैं। इस अवसर पर श्रीराधा-माधव का विशेष श्रृंगार किया जाता हैं।
9.श्रीगुरुपूर्णिमा महोत्सव :- आचार्य पीठ में यह महोत्सव आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। इस दिन गुरु की चरण पूजा करने का विधान है, इसलिए इस दिन प्रात: श्री ’’श्रीजी’’ महाराज श्रीहंस भगवान् एवं अपने पूर्वाचार्यों के चित्रपट्‌टों एवं समाधी स्थल का पूजन कर उन पर पुष्प अर्पित करते है। इसके पश्चात् युवराज जी के द्वारा अपने गुरु श्री ’’श्रीजी’’ महाराज का पूजन किया जाता है। इसके बाद में मन्दिर के पुजारियों के द्वारा आचार्य श्री के चरणों का पूजन किया जाता है। पुजारियों के पश्चात मन्दिर के परिकर महाराज श्री के चरणों का पूजन करते हैं। इसके बाद सायं लगभग 3.00 बजे से आचार्य पीठ में देश-विदेश से पधारे हुये महाराज श्री के भक्तों द्वारा आचार्य श्री के चरण कमलों की पूजा कर एवं श्री ’’श्रीजी’’ महाराज से आशीर्वाद लेकर अपना जीवन धन्य करते हैं।
10. झूलनोत्सव :- आचार्य पीठ में झूलनोत्सव श्रावण मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की तृतीया से प्रारम्भ होकर श्रावण मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की पूर्णिमा तक चलता है। यह उत्सव भी दर्शनीय है, झूलों की अनुपम छवि परम चित्ताकर्षक एवं आनन्दकारी होती है। झूलों की अनुपम छवि परम चित्ताकर्षक एवं आनन्दकारी होती है। झूलनोत्सव के समय आचार्य पीठ में नित्य नये एवं आकर्षक रूप में सुसज्जित झूलों में भगवान् श्रीसर्वेश्वर प्रभु, श्रीलड्डू गोपाल जी एवं श्रीगोकुलचँद्रमा जी को झूला झुलाया जाता है। भगवान् श्रीराधा-माधव का श्रीविग्रह अविचल होने के कारण उनकों झूलों में विराजमान नहीं कराया जाता है। झूलों को मन्दिर के पुजारी जी द्वारा विभि सामग्रियों यथा-फल, मेवों, सब्जियों एवं फूलों से श्रृंगारित किया जाता हैं। इन दिनों में आचार्य पीठ में विशेष चहल-पहल रहती है।
11. श्रीपरशुराम देवाचार्य जी महाराज का पाटोत्सव :- श्रीनिम्बार्क संप्रदाय की पीठ को पुष्कर परिक्षेत्र ​​स्थित श्रीनिम्बार्कतीर्थ (सलेमाबाद) में स्थापित करने वाले श्रीनिम्बार्काचार्यपीठाधीश्वर श्रीपरशुराम देवाचार्य जी महाराज का पाटोत्सव भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की पंचमी को आचार्य पीठ में मनाया जाता है। इस दिन भजन गायकों द्वारा स्वामी जी (श्रीपरशुराम देवाचार्य जी) महाराज द्वारा रचित पदों का गायन किया जाता है।
12. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव :- यह उत्सव आचार्य पीठ में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष (बदी) की अष्टमी को बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव की तैयारियाँ यहॉँ कई दिनों पूर्व ही शुरु हो जाती है। अष्टमी के दिन दिनभर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की तैयारी की जाती है। जिसमे मनमोहक फूल बंगला सजाया जाता है। तथा रात्रि के ठीक 12 बजे भगवान् श्रीकृष्ण की प्राकट्य झांकी का दर्शन कराया जाता है। जिसकी सूचना तोप दाग कर आसपास के क्षेत्र के सभी भक्तजनों को दी जाती है। इस अवसर पर यहाँ वृन्दावन के रासमण्ड़ल द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं का मंचन किया जाता है। इस समय पूरा श्रीनिम्बार्कतीर्थ क्षेत्र भगवान् श्रीकृष्ण के रंग में रंग जाता है। जन्माष्टमी के दिन आचार्य पीठ में भक्तों का अपार जनसमूह एकत्रित होता है। प्रभु के जन्म के पश्चात प्रसाद वितरण भी किया जाता है। जिसे दूर-दूर से आये हुये भक्तजन अपने साथ ले जाते है।
13. नन्द महोत्सव :- यह उत्सव जन्माष्टमी के दूसरे दिन भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष (बदी) की नवमी को मन्दिर प्रांगण में काफी जोश-और-खरोश केे साथ मनाया जाता है। तथा इस दिन नन्द बाबा के घर श्रीकृष्ण आगमन के उपलक्ष में आयोजित उत्सव की लीलाओं का रासमण्ड़ल द्वारा मंचन किया जाता है। एवं इसके साथ ही ’’नन्द के घर आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की’’ का उद्घोष किया जाता है। तथा बधाईयाँ गाई जाती है। इस अवसर पर श्री ’’श्रीजी’’ महाराज युवराज श्री के साथ स्वयं पधार कर धर्मप्रेमी भावुक भक्तजनों को आशीर्वाद प्रदान करते है। यह बड़ा ही दर्शनीय होता है।
14. मेला :- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दूसरे दिन भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष (बदी) की नवमी को मन्दिर के पास ही आचार्य पीठ में विशाल एवं भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में आस-पास के ग्रामीण अँचल के नर-नारियों के साथ-साथ देश-विदेश के अन्य लोग भी आकर इसका आनन्द उठाते है। मेले में आस-पास के ग्रामीण अँचल के नर-नारियों के साथ-साथ देश-विदेश के अन्य लोग भी आकर इसका आनन्द उठाते है। मेले में रंग-बिरंगी पगडि़यॉँ पहने पुरुष, गले एवं कान में विभि प्रकार के गहने पहन कर मेले का आनन्द लेते है। इनके साथ ही ग्रामीण महिलायें भी अपनी पारम्परिक वेशभूषा में विभिन्न लोक गीत गाते हुये मेले में आती है। जिन्हें देखकर ग्रामीण भारत की झाँकी सजीव हो उठती है। किशनगढ़ परिक्षेत्र में आयोजित होने वाला यह प्रथम मेला होने के कारण सभी ग्रामीण जनों का इस मेले के प्रति विशेष आकर्षण होता है। इन सब के साथ इस मेले में विभि प्रतियोगितायें आयोजित की जाती है। जिनमें प्रमुख निम्न है :-
(अ) तैराकी प्रतियोगिता :-यह प्रतियोगिता निम्बार्क सरोवर में आयोजित की जाती है। जिसको देखने के लिये सरोवर के चारो ओर अपार जनसमूह एकत्रित हो जाता है। इस प्रतियोगिता का शुभारम्भ श्री ’’श्रीजी’’ महाराज के सानिध्य में होता है। स्थानीय युवक इस प्रतियोगिता में भाग लेते है। तथा प्रतियोगिता जीतने के लिये अपने हाथ-पैर तेजी से सरोवर में चलाते है। तब उप​स्थित जनसमूह श्रीराधासर्वेश्वर भगवान् की जय बोलकर प्रतियोगियों का उत्साहवर्धन करते है। जो युवक इस प्रतियोगिता का विजेता घोषित किया जाता है। उसे स्वयं श्री ’’श्रीजी’’ महाराज अपने हाथों पुरस्कार प्रदान करते है। इसके पश्चात श्री ’’श्रीजी’’ महाराज एक नारियल सरोवर में फेकतें है, जिसे युवक लूटने का प्रयास करते है। जो युवक सरोवर में से नारियल निकाल कर ले आता है, उसे भी स्वयं श्री ’’श्रीजी’’ महाराज अपने हाथों पुरस्कार प्रदान करते है। इसके पश्चात तैराकी प्रतियोगिता का समापन किया जाता है।
(ब) मल्ल खम्भ प्रतियोेगिता :- यह प्रतियोगिता इस मेले का खास आकर्षण है। जिसे विशेष रूप से देखने के लिये दूर-दूर से दर्शक आचार्य पीठ में आते है। मल्ल खम्भ प्रतियोगिता मुख्य मन्दिर एवं संस्कृत महाविद्यालय के बीच के प्रांगण में आयोजित की जाती है। इसके लिये प्रांगण में लगभग 25 फुट लम्बा एक खम्भा गाड़ा जाता है। जिस पर मुलतानी मिी, साबुन एवं तेल का लेप पूर्व में ही किया हुआ होता है। इस खम्भे के शीर्ष पर प्रसाद से भरी हुई थैलियाँ बाँधी जाती है। जिन्हें तोड़ने का कार्य स्थानीय यादव समुदाय द्वारा ही किया जाता है। इसी खम्भे के पास लगभग 15 फुट ऊपर मचान बनाया जाता है। जिस पर केसर मिश्रित पानी से भरी हुई बाल्टीयाँ भर कर मन्दिर के कार्यकर्ता चढ़ जाते है। जैसे ही आचार्य श्री का आदेश होता है, मन्दिर प्रांगण में उप​स्थित हजारों नर-नारियों के समक्ष युवक खम्भे पर चढ़ने का प्रयास करते है। ठीक उसी समय मचान पर चढ़े कार्यकर्ता अपने पास रखे पानी की बौछार उस खम्भ एवं युवकों के समूह पर करते है। पानी से खम्भ पर लगी मुल्तानी मिी एवं साबुन गीली हो जाती है। जिसके कारण खम्भ के ऊपर चढ़ने का प्रयास कर रहे युवकों का समूह फिसलकर नीचे गिर जाता है। लेकिन ये हिम्मत नही हारते हुये पुन: नये जोश के साथ ऊपर चढ़ने का प्रयास करते है। इस समय पूरा वातावरण श्रीराधासर्वेश्वर प्रभु की जयकार से गुंजायमान हो उठता है। प्रभु के जयकारे एवं भक्तों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच यादव युवक बार-बार गिरते हुये अन्त में उन थैलियों को तोड़ने में सफल हो जाते है। इस दृश्य को जो एक बार देख लेता है, वो बार-बार इसे देखने अवश्य आता है। यह प्रतियोगिता सांयकाल लगभग 5.00 बजे आयोजित की जाती है।
15. श्रीसरस्वती आवाहन, पूजन एवं विसर्जन :- आश्विन मास (आसोज) की षष्ठी को श्रीसरस्वती के आवहन से यह उत्सव आचार्य पीठ में प्रारम्भ होता है। तथा आश्विन मास (आसोज) की नवमी को श्रीसरस्वती के विसर्जन के साथ सम्प होता है। श्रीसरस्वती आवहन के दिन वेद तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थों का पुराने महल में ​स्थित तोषागार पर पूजन किया जाता है। यह पूजन चार दिन तक चलता है। इन चार दिनों में आचार्य पीठ में अध्ययन कार्य एवं विद्यालय पूर्णत: बन्द रहते है। नवमी को श्रीसरस्वती के विसर्जन के पश्चात् ही पुन: अध्ययन कार्य प्रारम्भ किया जाता है।
16. विजयदशमी :- आश्विन मास (आसोज) की दशमी के दिन यह उत्सव आचार्य पीठ में मनाया जाता है। विजयदशमी के दिन पुराने महल में ​स्थित तोषागार (आयुध भण्डार) में उपलब्ध आयुधों जैसे- तलवार, भाला, बन्दूकें, राइफले, पिस्टल एवं रिवाल्वर का पूजन किया जाता है। इनके अतिरिक्त इसी दिन शमी (खेजड़ी), बही खाते तथा आचार्य पीठ के सभी वाहनों का भी पूजन किया जाता है। इसके बाद शाम को भगवान् श्रीराम की शोभायात्रा निकाली जाती है, जो निम्बार्क सरोवर तक जाकर पुन: मन्दिर तक आती है।
17. श्रीशरद पूर्णिमा महोत्सव :- यह महोत्सव अश्विन मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता हैं। शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं, क्योंकि इसी पूर्णिमा की रात्रि को भगवान् श्रीकृष्ण ने सभी गोपियों के साथ महारास किया था। इस दिन श्रीराधा-माधव प्रभु का श्वेत वस्त्रों से विशेष श्रृंगार किया जाता है। श्वेत वस्त्रों से श्रृंगारित श्याम वर्ण के श्री माधव प्रभु जी का श्रीविग्रह अति मनमोहक दिखाई देता है। श्रीराधा-माधव प्रभु की ऐसी विलक्षण झांकी के दर्शन कर भक्तजन अपनी सुध-बुध खो बैठते है। इस अवसर पर फूल बंगले का आयोजन भी किया जाता है। जिसे बाहर से आये हुये विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया जाता है। इस शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि को चँद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ श्रीराधा-माधव प्रभु के दर्शनों के लिये आते है एवं चाँंदनी के द्वारा भगवत् श्रीविग्रह के चरणारविन्दों का पूजन करते है। ऐसा दृश्य आपको विश्व में शायद ही कहीं अन्यत्र देखने को मिलेगा। इस अवसर पर स्थानीय एवं बाहर से पधारे हुये भजन कलाकारों द्वारा प्रभु के पदों का गायन किया जाता है। शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि पश्चात् आचार्य पीठ में आचार्य श्री के निर्देशन में योग्य एवं अनुभवी वैद्यों द्वारा तैयार विशेष औषधियों से युक्त खीर का वितरण किया जाता हैं। यह खीर गाय के शुद्ध दूध में 13 किलो 500 ग्राम चाँदी द्वारा निर्मित पात्र में तैयार की जाती है। यह चाँदी का पात्र इतना बड़ा है, कि इसमें एक बार में 120 कि0ग्रा0 दूध की खीर बनाई जा सकती है। इस खीर को हिलाने के लिये भी चाँदी के ही चम्मच का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि वैज्ञानिक रूप से यह ​सद्ध है, कि चाँदी में रोगाणुओं का नाश करने एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की शक्ति होती है। खीर बनाने के बाद उसे चँद्रमा की चाँदनी में रखा जाता हैं। ऐसा इसलिये किया जाता है, क्योंकि शरद पूर्णिमा की रात्रि को चँद्रमा से चाँदनी के रूप में अमृत बरसता है। इस प्रकार बनाई हुई औषधियों से युक्त खीर रूपी प्रसाद को ग्रहण कर दम दमा के रोगी ठीक होते हैं। आचार्य पीठ द्वारा इस दिन विशेष व्यवस्थायें की जाती हैं। दमा रोगी, जो इसका लाभ उठाना चाहते हैं उनके लिये ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें :-
(अ) औषध सेवन से पूर्व :- शरद पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से लेकर रात्रि 12 बजे तक (औषध सेवन तक) उपवास करें। किन्तु जल एवं तुलसीयुक्त जल मिश्रित गर्म दूध ले सकते हैं।
(ब) औषध सेवन के पश्चात :- औषध सेवन के दो महिने बाद तक लालमिर्च, तेल, खटाई, गुड़, तली हुई वस्तुऐं, छाछ, कढ़ी, चाय आदि का सेवन नहीं करें तथा गरिष्ठ पदार्थों का सेवन तो कभी भी नहीं करना चाहिये। ब्रह्मचर्य से रहें। साथ ही अधिक परिश्रम नहीं करे।
18. श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी महाराज का पाटोत्सव :- श्रीमहावाणीकार र​िसकराजराजेश्वर श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी महाराज का पाटोत्सव कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी को आचार्य पीठ में मनाया जाता है। श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी महाराज के चित्रपट्ट पर श्री ’’श्रीजी’’ महाराज द्वारा पुष्प अर्पित कर पूजन किया जाता हैं।
19. दीपोत्सव :- आचार्य पीठ में दीपोत्सव कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन आचार्य पीठ में श्रीमहालक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। तथा श्रीराधिकोत्थापन एवं दीपदान पूर्वक दीपमाला की परम मनोहर सुन्दर सजावट की जाती है।
20. अकूट महोत्सव :-अकूट महोत्सव दीपावली के दूसरे दिन अर्थात् कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की प्रतिपदा (एकम) को आचार्य पीठ में मनाया जाता है। आचार्य पीठ में यह उत्सव बड़े ही उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। इस दिन मन्दिर में गाय के गोबर से श्रीगोवर्धन का स्वरूप बनाकर उसे हरियाली से आच्छादित करते है। इसके पश्चात गाय तथा श्रीगोवर्धन के स्वरूप का पूजन किया जाता हैं। इसके साथ ही यहाँ पर विभिन्न प्रकार के अन्नों यथा चावल, मूँग, बाजरा तथा विभिन्न प्रकार की मिठाईयाँ, फल एवं साग-सब्जियों आदि से पहाड़ का रूप बनाया जाता हैं। तत्पश्चात् इनका पूजन कर प्रसाद के रूप में वितरण किया जाता है।
21. श्रीहंस सनकादिक जयन्ती तथा श्रीसर्वेश्वर प्रभु का प्राकट्य उत्सव :- यह उत्सव कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की नवमी को श्रीनिम्बार्काचार्य पीठ में तो मनाया ही जाता है। इसके साथ-साथ विश्व विश्रुत भक्तिमती मीरां बाई द्वारा समुपा​सित श्रीगिरिधरगोपाल मन्दिर श्रीपरशुुरामद्वारा स्थान-पुष्कर में विशेष रूप से मनाया जाता है। यहीं पर परमाचार्यवर श्रीपरशुरामदेवाचार्यजी महाराज के योग समाधि के सुन्दर दर्शन भी है।
22. श्री निम्बार्क जयन्ती महोत्सव :- अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्य पीठ में यह महोत्सव कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष (सुदी) की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन आचार्य पीठ में जगद्गुरु श्री ’’श्रीजी’’ महाराज के सानिध्य में निम्बार्क संप्रदाय के प्रवर्तक श्रीनिम्बार्क भगवान् का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। श्रीनिम्बार्क भगवान् का दुग्ध पंचामृत से महा अभिषेेक किया जाता है, मंगल बधाईयाँ गाई जाती है। मन्दिर में बान्दनवार बाँधी जाती है। इस अवसर पर भगवान् श्रीराधा-माधव के अविचल युगल श्रीविग्रह का श्रृंगार कर मनमोहक झाँकियाँ सजाई जाती है। इसके अतिरिक्त इस दिन श्रीनिम्बार्क भगवान् के जयघोष एवं राधे-राधे की ध्वनि के साथ गायकों द्वारा पद गायन एवं भक्ति रचनाओं की प्रस्तुतियाँ दी जाती है। इस दिन आप निम्बार्क सरोवर में कार्तिक पूर्णिमा स्नान के साथ-साथ जयन्ती महोत्सव में भाग लेकर प्रभु दर्शनों का लाभ उठा सकते है। श्रीनिम्बार्काचार्य पीठ के अतिरिक्त यह महोत्सव आचार्य पीठ द्वारा प्रतिष्ठापित एवं संचालित श्रीपरशुरामद्वारा स्थान-पुष्कर में, श्रीनिम्बार्कराधाकृष्णविहारीमन्दिर ब्रजधाम निम्बग्राम में, श्री श्रीजी की बड़ी कुंज वृन्दावन में, श्रीनिम्बार्क प्राकट्य धाम मूंगी-पैठन (महाराष्ट्र) में, हीरापुरा जयपुर में, श्रीराधासर्वेश्वर मन्दिर मदनगंज-किशनगढ़ में, तथा श्रीनिम्बार्कगोपीजनवल्लभ मन्दिर श्रीनिम्बार्ककोट अजमेर आदि में प्रतिवर्ष विशेष समारोह पूर्वक परमोल्लास के साथ मनाया जाता है।
23. छठी महोत्सव :- अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्य पीठ में यह महोत्सव मार्गशीर्ष (मंगसर) मास के .ष्ण पक्ष (बदी) की षष्ठी को मनाया जाता है। यह उत्सव निम्बार्क संप्रदाय के प्रवर्तक श्रीनिम्बार्क भगवान् के जन्म दिवस जो कार्तिक शुक्ल (सूदी) पूर्णिमा को है, के छठे दिन आचार्य पीठ में बड़े ही उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। इस दिन आचार्य पीठ में भव्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन श्री ’’श्रीजी’’ महाराज के सानिध्य में होता है। इस अवसर पर मंगल बधाई के पदेां का गायन, समाज गान, लोक संगीत नृत्य, महाआरती एवं स्तुति संकीर्तन आदि कार्यक्रम आयेजित होते है। इसके पश्चात् स्थानीय तथा बाहर से आये हुये ख्यातनाम कलाकारों द्वारा शास्त्रीय एवं अद्‍​र्धशास्त्रीय संगीत आधारित पद एवं भक्ति रचनाएं प्रस्तुत की जाती है। साथ ही भगवान् श्रीराधा-माधव के अविचल युगल श्रीविग्रह का भव्य श्रृंगार कर मनमोहक झाँकियाँ सजाई जाती है। छठी महोत्सव के दिन संध्या के समय सम्पूर्ण मन्दिर पर ​ मिट्टी के बड़े-बड़े दीपको में तेल एवं काकड़ा (कपास के बीज) डालकर उनको प्रज्जवलित कर रखा जाता है। यह दृश्य बहुत ही मनमोहक लगता है।
24. होलिका दहन :- आचार्य पीठ में होलिका दहन फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। 25. धूलिवन्दन (छारंडी) दोलोत्सव एवं फाग महोत्सव :- होलिका दहन के दूसरे दिन अर्थात् चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा (एकम्) को अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्य पीठ में यह महोत्सव मनाया जाता है। छारंडी के दिन संध्या के समय भगवान् श्रीराधामाधव, श्रीसर्वेश्वर प्रभु, श्रीगोकुलचँद्रमा जी तथा श्री बांके बिहारी जी को पुष्प, अबीर एवं गुलाल से चंग की थाप पर होली खिलाई जाती है। स्थानीय एवं बाहर से आये हुये गायकों के द्वारा होलियों का गायन किया जाता है। मन्दिर में आये हुये भक्तों को स्वयं श्री ’’श्रीजी’’ महाराज अपने हाथों से होली खिलाते है।
26. श्रीबालकृष्ण देवाचार्य जी महाराज का पाटोत्सव :- वर्तमान पीठाधीश्वर श्रीराधासर्वेश्वरशरण देवाचार्य जी महाराज के गुरू श्रीबालकृष्ण देवाचार्य जी महाराज का पाटोत्सव चैत्र कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। श्री ’’श्रीजी’’ महाराज इस दिन अपने गुरूश्री के चित्रपट्ट पर पुष्प अर्पित कर पूजन करते है।
27. अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) :- प्रत्येक तीसरे साल आने वाले अधिकमास के अवसर पर श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ में अनेक धार्मिक कार्यक्रम जिनमें भागवत कथा एवं अनेकाविध यज्ञादि का आयोजन किया जाता है। इस प्रकार पूरे अधिकमास आचार्य पीठ में धार्मिकता लिये हुये उत्सव पूर्ण वातावरण बना रहता है।