html lang="en"> सम्प्रदाय परिचय-अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ निम्बार्क-तीर्थ सलेमाबाद, अजमेर, राजस्थान


जगद्गुरु श्रीभगवन्निम्बार्काचार्यजी महाराज


श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय :-
वैष्णव चतु:सम्प्रदाय में श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय अत्यन्त प्राचीन अनादि वैदिक सत्सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के आद्याचार्य श्रीसुदर्शनचक्रावतार जगद्गुरु श्रीभगवन्निम्बार्काचार्य है । आपकी सम्प्रदाय परम्परा चौबीस अवतारों में श्रीहंसावतार से प्रारम्भ होती है। श्रीहंस भगवान्‌ से जिस परम दिव्य पंचपदी विद्यात्मक श्रीगोपाल-मन्त्रराज का गूढतम उपदेश जिन महर्षिवर्य चतु: सनकादिकों को प्राप्त हुआ, उसी का दिव्योपदो देवर्षिप्रवर श्रीनारदजी को मिला और वही उपदेश द्वापरान्त में महाराज परीक्षित के राज्यकाल में श्रीनारदजी से श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ को प्राप्त हुआ। निखिलभुवनमोहन सर्वनियन्ता सर्वेश्वर भगवान्‌‌ श्रीकृष्ण की मंगलमयी पावन आज्ञा शिरोधार्य कर चक्रराज श्रीसुदर्शन ने ही इस धराधाम पर भारतवर्ष के दक्षिण में महर्षिवर्य श्रीअरूण के पवित्र आश्रम में माता जयन्तीदेवी के उदर से श्रीनियमानन्द के रूप में अवतार धारण किया।
अल्पवय में ही माता जयन्ती, महर्षि अरूण के साथ उत्तर भारत में व्रजमण्डल स्थित गिरिराज गोवर्धन की सुरम्य उपत्यका तलहटी में आपने निवास किया, जहाँ पर आपको देवर्षिप्रवर श्रीनारदजी से वैष्णवी दीक्षा में वही पंचपदी विद्यात्मक श्रीगोपालमन्त्रराज का पावन उपदो तथा श्रीसनकादि संसेवित श्रीसर्वेश्वर प्रभु, जो सूक्ष्म शालग्राम स्वरूप दक्षिणावर्ती चक्रांकित है, उनकी अनुपम सेवा प्राप्त हुई यह सेवा श्रीहंस भगवान्‌ से श्रीसनकादिकों को और इनसे श्रीनारदजी को मिली, जो आगे चलकर द्वापरान्त में श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ को प्राप्त हुई। वही सेवा अद्यावधि अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ में आचार्य परम्परा से चली आरही है। श्रीसुदर्शनचक्रराज ही नियमानन्द के रूप में इस भूतल पर प्रकट हुए और आप ही श्रीनिम्बार्क नाम से परम विख्यात हुए। सूर्यास्त के समय जगत्स्रष्टा श्रीब्रा ने छ रूप से एक दिवाभोजी दण्डी यति के रूप में व्रज में गिरिराज के निकटवर्ती आश्रम में सूर्यास्त होने पर भी नियमानन्द से निम्बवृक्ष पर सूर्य दर्शन कराके उनका भोजनादि से आतिथ्य ग्रहण किया, जिससे श्रीब्राजी ने उन्हें श्रीनिम्बार्क नाम से सम्बोधित किया। इसी से आप श्रीनिम्बार्क नाम से ही विव विख्यात हुए।
आपने प्रस्थानत्रयी पर भाष्य रचना कर स्वाभाविक द्वैताद्वैत नामक सिद्धान्त का प्रतिष्ठापन किया। वृन्दावननिकुंजविहारी युगलकिशोर भगवान्‌ श्रीराधाकृष्ण की श्रुति-पुराणादि शास्त्रसम्मत रसमयी मधुर युगल उपासना का आपने सूत्रपात कर इसका प्रचुर प्रसार किया। कपालवेध स़िद्धान्तानुसार विद्धा एकादाशी त्याज्य एवं शुद्धा एकादाशी ही ग्रा है, व्रतोपवास के सन्दर्भ में यही आपश्री का अभिमत सुप्रसिद्ध है। सम्प्रदाय के आद्य-प्रवर्तक आप ही लोक-विश्रुत हैं। आपका प्रमुख केन्द्र व्रज में श्रीगोवर्धन के समीप निम्बग्राम ही रहा है। जिसका संरक्षण परम्परा से अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ, निम्बार्कतीर्थ के अधीनस्थ है। श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ के पट्‌टाष्य पांचजन्य शंखावतार श्री श्रीनिवासाचार्यजी महाराज ने श्रीभगवन्निम्बार्काचार्य कृत वेदान्त पारिजातसौरभाख्य ब्रसूत्र भाष्य पर वेदान्त कौस्तुभ भाष्य की बृहद् रचना की। श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ द्वारा विरचित वेदान्त कामधेनु दालोकी पर आचार्यवर्य श्रीपुरूषाेामाचार्यजी महाराज ने वेदान्तरत्नमंजूषा नामक वृहद भाष्य को रचा, जो परम मननीय है। पूर्वाचार्य परम्परा में जगद्विजयी श्रीकोवकामीरिभट्‌टाचार्यजी महाराज ने वेदान्त कौस्तुभ भाष्य पर प्रभावृा नामक विस्तृत व्याख्या का प्रणयन किया। श्रीमद्भगवद्गीता पर भी आप द्वारा रचित तत्व-प्रकाशिका नामक व्याख्या भी पठनीय है। इसी प्रकार आपका क्रमदीपिका तन्त्र ग्रन्थ अति प्रसिद्ध है। आपने मथुरा के विश्राम घाट पर तान्त्रिक यवन काजी द्वारा लगाये गये यन्त्र को अपने यन्त्र से विफल कर हिन्दू संस्कृति एवं वैदिक सनातन वैष्णव धर्म की रक्षा की। आपके परम प्रख्यात प्रमुख शिष्य रसिकाचार्य श्री श्रीभट्‌टाचार्यजी महाराज ने व्रजभाषा में सर्वप्रथम श्रीयुगलातक की रचना कर व्रजभाषा का उत्कर्ष बढाया। आपकी यह सुप्रसिद्ध रचना व्रजभाषा की आदिवाणी नाम से लोक विख्यात है। आपके ही परम पट्‌टाष्य जगद्गुरु निम्बार्काचार्य पीठाधीवर रसिकराजराजेवर श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज ने व्रजभाषा में ही श्रीमहावाणी की रचना कर जिस दिव्य निकुंज युगल मधुर रस को प्रवाहित किया, वह व्रज-वृन्दावन के रसिकजनों का सर्व शिरोमणि देदीप्यमान कण्ठहार के रूप में अतिशय सुशोभित है। आपश्री ने जम्बू में बलि ली जाने वाली देवी को वैष्णवी दीक्षा देकर उसे प्राणियों की बलि से मुक्त कर सात्विक वैष्णवी रूप प्रदान किया। आपने श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ कृत वेदान्त कामधेनु दालोकी पर सिद्धान्त रत्नांजलि नाम से दिव्य विस्तृत व्याख्या की रचना कर वैष्णवजनों पर अनुपम कृपा की है।
श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज के द्वादश प्रमुख शिष्यों में पट्‌टाष्य श्रीपरशुरामदेवाचार्यजी महाराज ने राजस्थान में पुष्कर क्षेत्र में अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ की संस्थापना की, जो सम्पूर्ण भारत में एकमात्र सर्वमान्य आचार्यपीठ है।
आचार्य पीठ परम्परा में अब तक 48 आचार्य हुये है। जो निम्न कार से है:-
आचार्य श्री अवधि उत्सव मास तिथी
1- श्री हंस भगवान्‌ ----------- कार्तिक शुक्ल नवमी
2- श्री सनकादिक भगवान्‌ ----------- कार्तिक शुक्ल नवमी
3- देवर्षि श्री नारद भगवान्‌ ----------- मार्गाशीर्ष शुक्ल द्वादाशी
4- श्री सुदर्शन चावतार श्री निम्बार्कचार्य जी -------- कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा
5- श्री श्रीनिवासाचार्य जी ----------- माघ शुक्ल पंचमी
श्री हंस भगवान से लेकर श्री श्रीनिवासाचार्य जी पर्यन्त इन पाचों आचार्यो को आचार्य पंचायतन के नाम से भी जाना जाता है। आपकी सेवा-पूजा भी भगवान्‌ के समान ही होती है।
6- श्री विवाचार्य जी ----------- फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी
7- श्री पुरुषोत्तमाचार्यजी ----------- चैत्र शुक्ल षष्ठी
8- श्री विलासाचार्य जी ----------- वैशाख शुक्ल अष्टमीv 9- श्री स्वरूपाचार्य जी ----------- ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी
10- श्री माधवाचार्य जी ----------- आषाढ़ शुक्ल दामी
11- श्री बलभद्राचार्य जी ----------- श्रावण शुक्ल तृतीया
12- श्री पद्माचार्य जी ----------- भाद्र शुक्ल द्वादाशी
13- श्री यामाचार्य जी ----------- आविन शुक्ल त्रयोदशी
14- श्री गोपालाचार्य जी ----------- भाद्र शुक्ल एकादी
15- श्री पाचार्य जी ----------- मार्गाशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा
16- श्री देवाचार्य जी ----------- माघ शुक्ल पंचमी
17- श्री सुन्दर भट्‌टाचार्य जी ----------- मार्गाशीर्ष शुक्ल द्वितीया
18- श्री पद्मनाभ भट्‌टाचार्य जी ----------- वैशाख कृष्ण तृतीया
19- श्री उपेन्द्र भट्‌टाचार्य जी ----------- चैत्र कृष्ण चतुर्थी
20- श्री रामचन्द्र भट्‌टाचार्य जी ----------- वैशाख कृष्ण पंचमी
21- श्री वामन भट्‌टाचार्य जी ----------- ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी
22- श्री कृष्ण भट्‌टाचार्य जी ----------- आषाढ़ कृष्ण नवमी
23- श्री पद्माकर भट्‌टाचार्य जी ----------- आषाढ़ कृष्ण अष्टमी
24- श्री श्रवण भट्‌टाचार्य जी ----------- कार्तिक कृष्ण नवमी
25- श्री भूरि भट्‌टाचार्य जी ----------- आविन कृष्ण दशमी
26- श्री माधव भट्‌टाचार्य जी ----------- कार्तिक कृष्ण एकादाशी
27- श्री याम भट्‌टाचार्य जी ----------- चैत्र कृष्ण द्वादाशी
28- श्री गोपाल भट्‌टाचार्य जी ----------- पौष कृष्ण एकादाशी
29- श्री बलभद्र भट्‌टाचार्य जी ----------- माघ कृष्ण चतुर्दशी
30- श्री गोपी नाथ भट्‌टाचार्य जी ----------- श्रावण शुक्ल सप्तमी
31- श्री कोव भट्‌टाचार्य जी ----------- चैत्र शुक्ल तिपदा
32- श्री गांगल भट्‌टाचार्य जी ----------- चैत्र कृष्ण द्वितीया
33- श्री कोव कामिरी भट्‌टाचार्य जी 13वीं शताब्दी ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी
34- श्री श्रीभट्‌ट देवाचार्य जी 13वीं शताब्दी का अंत एवं 14वीं शताब्दी का आरम्भ आविन शुक्ल द्वितीया
35- श्री हरिव्यास देवाचार्यजी 14वीं शताब्दी का अंत एवं 15वीं शताब्दी का आरम्भ कार्तिक कृष्ण द्वादाशी
36- श्री परशुराम देवाचार्य जी वि0 सं0 1514 से 1664 तक भाद्र कृष्ण पंचमी
37- श्री हरिवां देवाचार्य जी वि0 सं0 1664 से 1700 तक मार्गाशीर्ष कृष्ण सप्तमी
38- श्री नारायण देवाचार्य जी वि0 सं0 1700 से 1755 तक पौष शुक्ल नवमी
39- श्री वृन्दावन देवाचार्य जी वि0 सं0 1753 से 1800 तक भाद्र कृष्ण त्रयोदशी
40- श्री गोविन्द देवाचार्य जी वि0 सं0 1797 से 1814 तक कार्तिक कृष्ण पंचमी
41- श्री गोविन्द शरण देवाचार्य जी वि0 सं0 1814 से 1841 तक कार्तिक कृष्ण अष्टमी
42- श्री सर्वेश्वर शरण देवाचार्य जी वि0 सं0 1841 से 1870 तक पौष कृष्ण षष्ठी
43- श्री निम्बार्क शरण देवाचार्य जी वि0 सं0 1870 से 1897 तक ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी
44- श्री ब्रजराज शरण देवाचार्य जी वि0 सं0 1897 से 1900 तक ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी
45- श्री गोपीवर शरण देवाचार्य जी वि0 सं0 1900 से 1928 तक माघ कृष्ण दशमी
46- श्री घनयाम शरण देवाचार्य जी वि0 सं0 1928 से 1963 तक आविन कृष्ण षष्ठी
47- श्री बालकृष्ण शरण देवाचार्य जी वि0 सं0 1963 से 2000 तक चैत्र कृष्ण त्रयोदशी
48- श्री राधासर्वेश्वर शरण देवाचार्य जी वि0 सं0 2000 से वर्तमान तक ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया