द्वेताद्वेत सिद्धांत


द्वैताद्वैत सिद्धान्त :-
भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य का दार्शनिक सिद्धान्त स्वाभाविक द्वैताद्वैत अथवा भेदाभेद के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीवेदव्यास प्रणीत ब्रसूत्र के भाष्यों में विभिन्न आचार्यों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से अपने दार्शनिक मतों का प्रतिपादन किया है। इस सभी मतवादों में श्रीनिम्बार्काचार्य का द्वैताद्वैत मत अन्यतम है। उनके मतानुसार ब्रह्मका जीव और जगत्‌ से स्वरूपत: भेदपरक अभेदपरक दोनों ही रूपों में सम्बन्ध हैं। इस मत को द्वैत भिन्नता मानने वाला और अद्वैत अभिन्नता मानने वाला मत से सम्बोधित किया जाता हैं। वास्तव में इस मत में सत्यता भी प्रतीत होती है। कार्य:कारण सम्बध पर विचार करने से इस मत की पुष्टि हो जाती हैं जैसे कार्य घट कारण मिट्‌टी से भिन्न भी है। और साथ ही अभिन्न भी। क्योंकि दोनों के नाम, रूप, आकार आदि में भिन्नता है, किन्तु दोनों की सामग्री एक होने से अभिन्नता भी है। इसी प्रकार जगत्‌ कार्य ब्रह कारण और अभिन्न उभय रूप है।
विचारपूर्वक यदि देखा जाये तो यह निचय होता है कि ब्रह्म अपनी अनन्त ाक्ति से जीव और जगत्‌ रूप में प्रकाात होने के कारण उनसे अभिन्न रूप में प्रतिष्ठापित है। साथ ही अतीत रूप में विद्यमान होने के कारण जीव और जगत्‌ से भिन्न भी है। अत: ब्रह्म , जीव और जगत्‌ में परस्पर भेद द्वैत और अद्वैत दोनों ही है। और यही श्रीनिम्बार्काचार्य का प्रतिपाद्य है। उनके इस द्वैताद्वैतवादी सिद्धान्त को विस्तार से दयंगम करने के लिए ब्रह्म , जीव और जगत्‌ सम्बन्धी उनकी मान्यताओं का विस्तृत विवेचन आवयक है।
श्रीनिम्बार्काचार्य ने ब्रह्म को आनन्दमय कहा है, जिसमें आनन्द की प्रचुरता का ही प्राधान्य है। आनन्दमय का अर्थ विकारवान्‌ कदापि नहीं, उसका आनन्द भूमा की अवस्था में जाकर स्थित होता है। वस्तुत: जीवात्मा को आनन्द देने के कारण भी परमात्मा ही आनन्दमय कहा जावेगा। ब्रह्म जगत्‌ का केवल प्रकृति अर्थात्‌ उपादान कारण नहीं है, वह जगत्‌ का निमित्तकारण भी है। क्योंकि उसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता हैं। अमूर्त मूर्त हो जाता है। अविज्ञात विशेष रूप से ज्ञात हो जाता है। जैसे एक मिट्‌टी के ढेले को देखने से सम्पूर्ण मिट्‌टी के पदार्थों का ज्ञान हो जाता है। अत: परमात्मा की जगत्‌ का कारण है, ऐसा निचय होता है। वह सृष्टि का उपादान कारण भी है। क्योंकि उसने अभिलाषा की कि मैं बहुत हो जॉं इस वाक्य से भी अभिलाषा प्रकट करने वाला ब्रह्म चैतन्य स्वतन्त्र परमात्मा हैं। वह आनन्दमय, अप्राकृत, सर्वाक्तिमान्‌, पुरुषोत्तमस्वरूप हैं उसे किसी वस्तु की आवयकता नहीं पडती, क्योंकि जब वह सृष्टि करने की कामना करता है, तो संकल्पमात्र से सृष्टि कर लेता है। श्रुतियों का भी एकमात्र ब्रह्म प्रतिपाद्य है। ‘रसो वै स:‘ आनन्दं ब्रह्म आदि उसी के द्योतक हैं। आनन्द उसका ही एक विाष्ट गुण है, जिसका कि पृथक्‌-प्‌थक्‌ रूप से उल्लेख हुआ है। उन सबका उपसंहार उस परमात्मा में ही समझना चाहिए। वह स्वरूपत: अव्यक्त होते हुए भी भक्तियोग में ध्यान द्वारा व्यक्त हो जाता है। ब्रज्ञान की उपलब्धि होने पर विशुद्ध अन्त:करण में उस ब्रह्म की स्पष्ट झॉंकी परिलक्षित होती है।
वह भक्ति से ही सर्वसुलभ हैं। वह सर्वप्रकार से परिपूर्ण, चिद्रूप और विभु है। सम्पूर्ण जीव उसी के चिदां की किरणों के रूप में विद्यमान है। वह अपनी शक्ति का अनुभवमात्र करने से संसार कर रूप धारण करता है। वस्तुत: वह ब्रह्म नानारूपी विव का सृष्टि, लय आदि का हेतु है। अचिन्त्य शक्तियों का आधार भी वहीं है। वेदों का प्रतिपाद्य, जगत्‌-जीवमय विवात्मा, सर्वरूप से भिन्नभिन्नावस्था में रहते हुए आनन्दमय परमतत्व वासुदेव के रूप में प्रतिभासित होता हैं वही परमात्मा मायाधीा हैं। जन्म आदि विकारों से शून्य, स्वाभाविक और अचिन्त्य अनेक गुणों का सागर, विभूति सम्पन्न है। वह मुक्त जीवों को ऐवर्यानुभूति कराता है। वह सत्यकाम और सत्यसंकल्पवान्‌ है। जीवों के स्वरूप का आविर्भावकर्ता, मुक्ति-प्रदाता भी वही है। उसी की परम कृपा से जीवों का उसकी प्राप्ति होती हैं वह अन्तर्यामी रूप् से सर्वत्र विद्यमान है। वह सुख-दु:ख के भोगने वाले शरीरी जीवों से अधिक उत्कृष्ट है। शरीर का भी कर्ता है। आत्मा के अन्दर वह परमात्मा ही शासनकर्ता है। श्रीनिम्बार्काचार्य की दृष्टि में वस्तुत: सम्पूर्ण जगत्‌ की सृष्टि आदि का कारण ब्रह्म ही है। उसकी अध्यक्षता में ही प्रकृति-चराचरात्मक जगत्‌ की सृष्टि करती है। प्रकृतिस्थ जगत्‌ का एकमात्र अधिष्ठाता ब्रह्म ही है।
जीव :-
श्रीनिम्बार्काचार्य ने वेदान्तकामधेनु के एक ही लोक में जीव के वास्तविक स्वरूप का प्रतिपादन कर दिया है। ये आत्मवेत्ता, जीव को चैतन्य ज्योतिस्वरूप शरीर से संयुक्त और वियुक्त होने वाला, अणु परिमाण वाला, सूक्ष्म, अनेक शरीरों में अलग-अलग होने से अनन्त तथा इसे परमात्मा के अधीन कहते हैं-
ज्ञानस्वरूपं च हरेरधीनं शरीरसंयोगवियोगयोग्यम्‌।
अणुं हि जीवं प्रतिदेह-भिन्नं ज्ञातृत्ववन्तं यदनन्तमाहु:।।
ब्रह्म का अंश होने के नातें जीव भी ब्रह्म ही है, तथापि जीव और ब्रह्म का पूर्णत: अभेद स्वीकार्य नहीं, भेदाभेद सम्बन्ध ही मान्य है। जीव को स्वरूपत: अणु मानते हुए भी श्रीनिम्बार्क ने उसके गुण और ज्ञान को विभु की संज्ञा दी है। अणु,चित्‌ होते हुए उसका ब्रह्म से नित्य सम्बन्ध रहता है। इस प्रकार भ्गवत्‌ साधर्म्य प्राप्त कर जीव सर्वज्ञ की कोटि में पहूँच जाता है। जिस प्रकार महान्‌ गुण के कारण परमात्मा महान्‌ है, उसी प्रकार जीवात्मा अणु परिणाम का होकर भी गुण से महान्‌ है। जीवात्मा अणु परिमाण वाला होकर भी शरीर के दु:ख-सुख का अनुभव करता हैं।

जीवात्मा के प्रकाश से ही सारा शरीर प्रकाशित होता है, ठीक वैसे ही जैसे कि कमरें में एक स्ान पर स्थित दीपक सारें कमरें को अलोकित करता हैं।
श्रीनिम्बार्काचार्य के अनुसार आनन्दमय परमात्मा ही है, जीव नहीं। वस्तुत: ब्रह्म का संयोग पाकर ही जीव आनन्दानुभव करता है। बद्ध जीव को इसीलिए अज्ञ अथवा अल्पज्ञ की संज्ञा दी गई है। ब्रह्म के साथ जीव का क्रमा: विभु और अणु का सम्बन्ध ही स्ाापित होता है। जीवात्मा न तो जन्म लेता है और न ही मरता है। वह नित्य और अजन्मा है। इससे जीव की नित्यता भी सिद्ध होती है। मुक्त जीव ब्रह्म का साक्षात्कार करके उसके पूर्ण आनन्द में निमग्न हो जाता है। किन्तु बद्ध जीव को आनन्दात्मक जगत्‌ का अनुभव केवल जडरूप में ही प्रतिभाकसित होता हैं। उसे अपने चिदांस्वरूप का विस्मरण हो जाता है। यद्यपि चिदां-रूप होने के नाते जीव और उसके ज्ञान में कोई अन्तर प्रतीत नहीं होता।

जगत् आनन्दायोग से जीवात्मा पर शासन करता है। अर्थात् जीव अन्तर्यामी परमात्मा द्वारा नियन्त्रित होता है। वह उस परमात्मा से भिन्न भी है, जिसके प्रकाश से आनन्दायोग की स्थिति बनती है। वह परमात्मा रसस्वरूप है, जिस रस की अनुभूति कर जीवात्मा आनन्दित होता है। इस प्रकार जीव और ब्रह्म के बीच स्वरूपत: गुणत: एवं शक्तित: शाश्वत भेद है। किन्तु भोक्ता जीव और नियन्ता ब्रह्म के बीच यी भेद ठीक वैसा ही हैं, जैसाकि समुद्र और उसकी तरंग एवं सूर्य और उसकी प्रभा के बीच विद्यमान है। अत: यह ब्रह्म औश्र जीव के बीच अभेदत्व के साथ भेदत्व सिद्ध हुआ। निष्कर्ष यह कहा जा सकता है कि जीव या चित् ज्ञानस्वरूप और ज्ञानाश्रय हैं। वह ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता हैं! वह अणु है मुक्तावस्था में भी वह कत्‍​र्ता रहता हैं। उस समय ईश्वर से केवल एक बात से भिन्न रहता है। वह यह कि ईश्वर नियन्ता है। और जीव नियम्य। अंशांशिभाव रहने से जीव और परमात्मा में भेदाभेद दिखाया गया है। वस्तुत: जीव परमत्मा का अंश है, कारण ‘ज्ञ‘ (सर्वज्ञ) ‘ईश‘ (ईश्वर) और ‘अंज्ञ‘ (असर्वज्ञ) ‘अनीश (जीव) दोनों ही ‘अज‘ (जन्मरहित एवं नित्यसत्य) हैं-इस श्रुति वाक्य में जीव और ईश्वर में भेद उपदिष्ट हुआ है।
इस प्रकार श्रीनिम्बार्काचार्य ने ब्रह्म और जीव में भेदाभेद सम्बन्ध स्​िाापित किया है। इस बात की उन्होंने स्पष्ट घोषणा की है कि जीव ब्रह्म का अंश होने से उनके बीच परस्पर भेदाभेद सम्बन्ध भी नित्य शाश्वत और स्वाभाविक है।
जगत्-
श्रुति इस बात का प्रमाण है कि ब्रह्म ही जगत् रूप से प्रकाशित है। श्रीनिम्बार्काचार्य ने ‘‘आत्मकृते परिणामात्‘‘ सूत्र के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा है कि सर्वश्क्तिमान् परमात्मा स्वशक्ति के विक्षेप से जगत् के आकार में परिणत हो जाता है। वह अव्याकृत स्वरूप में रहकर ही अपनी शक्ति और कृति से जगत् रूप को प्राप्त होता है। ब्रह्म ही निमित्त और उपादान कारण है। जगत् उसी की अनुकृति है।
जगत् ब्रह्म की लीलार्थ की हुई संकल्पमूलक परिणति है। कार्य जगत् का कारण ब्रह्म से अनन्यत्व (अभेद) सम्बन्ध है, अत्यन्त भिन्नत्व (भेद) नहीं है। मृत्तिका सत्य है, क्योंकि उसके द्वारा निर्मित घटादि भिन्न प्रतीत होते हुए भी पृथ्वी के ही विकृत रूप होने के कारण उससे अभिन्न ही है। वस्तुत: यह सारा दृश्यमान जगत् परमात्मास्वरूप ही सत्य प्रतीत होता है। क्योंकि कारण और कार्य में न तो सर्वथा भेद ही होता है और न अभेद ही। भेदाभेद ही नित्य​िसद्ध रहता है। कार्य के दोषों से मुक्त होता है। इसी प्रकार जगत् (कार्य) के दोष ब्रह्म कारण में नहीं होते। परमात्मा के व्यक्त और अव्यक्त दोनों रूप् एक साथ ही स्वीकार किये जाते हैं। मूर्त और अमूर्त (स्थूल और सूक्ष्म) विश्व (जगत्) अपने कारण रूप ब्रह्म में भिन्नाभिन्न सम्बन्ध से रह सकता है। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार सर्प इच्छानुसार कुण्डली बनाकर बैठ जाता है और अपनी इच्छानुसार ही विस्तृत हो जाता है। इसी प्रकार ब्रह्म अपने संकल्पमात्र से ही जगत् की सृष्टि और लय का हेतु है।
उक्त अहि कुण्डल न्याय से ​स्थित विश्व को ब्रह्म से भिन्न भी नहीं कह सकते और सर्वथा अभिन्न भी नहीं कहा जा सकता। बद्ध और मुक्त जीवों की आसक्ति और अनासक्ति का कारण भी यह जगत् ही है। ब्रह्म का शक्ति होने के कारण जगत् भी नित्य सत्य है, किन्तु नित्य होते हुए भी वह परिवर्तनशील है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान रूपों से प्रकाशित समग्र जगत् परमात्म ज्ञान में नित्यरूप से प्रतिष्ठापित है। यह जगत् पहले से ही सत्तावान था। प्रत्येक वस्तु की सत्ता थी, जो कालान्तर में जगत् रूप में प्रकट होगई। यह जगत् भी प्रलय होने पर सूक्ष्म रूप से संकुचित होकर परमात्मा में ​स्थिर ही जाता है और सृष्टि के समय पुन: इसका विस्तार होने लगता है। जगत् की सृष्टि आदि तथा नानारूपता में परिणत ब्रह्म की सर्वशक्तिमत्ता द्वारा ही होती है। जगत् का एकमात्र आधार ब्रह्म ही है, क्योंकि वह नियन्ता एवं अन्तर्यामी रूप से सदैव विद्यमान होता है। कुम्हार को घट के निर्माण करने में चक्र, मिट्ठी, दण्ड आदि बाह्य उपकरणों का संग्रह करना पडता हैं, किन्तु परमात्मा तो ऐसा नहीं करता। वह तोदूध से दही अथवा जल से बर्फ की भॉंति प्राकृतिक शक्ति सक स्वत: जगत्रूप मे परिणत हो जाता हैं। वस्तुत: आनन्दमय, सर्वश्क्तिमान् पुरुषोत्तम को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पडती, क्योंकि जब वह सृष्टि करने की कामना करता है तो संकल्प मात्र से जगत् की सृष्टि कर लेता है। यथा-उसने कामना की मैं एक से बहुत हो जाऊॅं। जिस प्रकार कपडे़ को प्रथम समेटकर बाद में पुन: विस्तृत कर दिया जाये, उसी परमात्मा भी विश्व को अपने में समेटकर पुन: उसे प्रसारित कर देता है। इससे प्रलय के बाद भी जगत् की सत्ता ​िसद्ध होती है। पुन: स्पष्ट करते हैं। कि जैसे प्राणायम की क्रिया द्वारा रूककर प्राणवायु अपने संकुचित रूप में अव​स्थित रहता है, वैसे ही यह जगत् भी प्रलय होने पर सूक्ष्म रूप से संकुचित होकर परमात्मा में ​स्थिर हो जाता है और सृष्टि के समय पुन: विस्तृत हो जाता है। अत: जगत् और ब्रह्म का कार्यकारण, शक्ति-शक्तिमान् के आधार पर परस्पर भेदाभंद सम्बन्ध का ही प्रतिपादन किया गया है।
उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है श्रीनिम्बार्काचार्य ने ब्रह्म को सगुण् और निर्गुण दोनों रूपों में स्वीकार किया है। जीव और जगत् की सत्यता पर भी उन्होंने बल दिया है। उनकी द्ष्टि में जीव और जगत् सत्य है, मिथ्या नहीं। श्रीनिम्बार्काचार्य का अद्वैत (ब्रह्म) द्वैत (जीव, जगत्) से पृथक् नही है, अपितु जीव और जगत् को ब्रह्म का अंगीभूत रूप् से एक करके ही है। किन्तु अद्वैत मतावलम्बी अद्वैत (बह्म) में जीव और जगत् का स्​न स्वीकार नहीं करते, इसलिए कि उनके मत में जगत् मिथ्या है और जीव पृथक् रूप् से कोई अ​स्तित्व ही नहीं है। फिर भी आश्चर्यजनक तो यह है कि अद्वैत (ब्रह्म) की सत्ता का पूर्ण समूर्थन करते हुए भी वे (अद्वैतवादी) जीव और जगत् की सत्त को स्वीकार न कर सके। उन्हें व्यावहारिक भाव से जीव और जगत् की सत्ता स्वीकार करना पड़ा। ब्रह्म से भिन्न करने से व्यावहारिक रूप् से जीव और जगत् की सत्ता स्वीकार करने के कारण द्वैतवाद की प्रतिष्ठा होती है। अत: अद्वैतवादियों के मत की यथार्थ पुष्टि नहीं होती। वस्तुत: द्वैताद्वैतवादी श्रीनिम्बार्काचार्य ही यथार्थ रूप में अद्वैतवादी हैं, क्योंकि उनके द्वैताद्वैतवाद में अद्वैत (ब्रह्मवाद) और द्वैत (जीव, जगद्वाद) सत्ता का एकपक्षीय द्योतन न होकर उभयपक्षीय द्योतन होता है। यही द्वैताद्वैतवाद की परम विशेषता है। इसमें समन्वय की अभूतपूर्ण क्षमता विद्यमान है।
द्वैताद्वैत की ​स्थिति को कुछ उदाहरणों द्वारा आसानी से समझा जा सकता है -
(1) जैसे कार्य (घट या घड़ा) कारण (मिट्टी) से अभिन्न है, क्योंकि दोनो की सामग्री एक ही है। और साथ ही भिन्न भी है, क्योंकि दोनों नाम, रूप, आकार एवं प्रयोजन आदि से पृथक-पृथक है।
(2) सोने (स्वर्ण) से अनेक प्रकार के आभूषण निर्मित किये जाते है। जिनके नाम, रूप एवं प्रयोजन अलग-अलग है, लेकिन इन सभी का एक ही सार तत्व है ’’स्वर्ण’’।
(3) सर्प के लम्बायमान रूप और कुण्डलाकार रूप की पृथक ​िस्थति हैं। परन्तु दोनों में भेद होते हुए भी इनमें अभेद सम्बन्ध है।
(4) जिस प्रकार सूर्य और प्रकाश अलग-अलग है, परन्तु सूर्य के बिना प्रकाश का अ​स्तित्व नहीं है। अर्थात् सूर्य और प्रकाश अलग-अलग होते हुये भी एक है। उसी तरह ब्रह्म तथा जीव अलग-अलग होते हुये भी एक है।
वैसे ही संसार (कार्य) ब्रह्म (कारण) से भिन्न और अभिन्न दोनों है। जगत् ब्रह्म से अलग होते हुए भी एक ही है। ब्रह्म को एकत्व नहीं कह सकते, वैसे ही जगत् भी एकत्व नहीं है। अत: जगत् के अलग होने पर भी ब्रह्मत्व का एकत्व अक्षुण्ण है। तथा एकत्व ब्रह्मत्व में ही विद्यमान है। श्रीनिम्बार्काचार्य जी के अनुसार ब्रह्म अद्वैत है, संसार द्वैत है। दोनों नित्य सत्य है। अद्वैत ब्रह्म (कारण) ही द्वैत संसार (कार्य) का वास्तविक रूप धारण करता है।
इस तरह जिस ​सिद्धान्त में द्वैत और अद्वैत का मिलन हो वही ​िसद्धान्त द्वैताद्वैत कहलाता है। इसमें कहीं भी विरोधा विरोधाभास नहीं है। इसे भेदाभेद वाद के नाम से भी जाना जाता हैं।
द्वैताद्वैत ​सिद्धान्त है, स्वाभाविक श्रुति सार।
राधाकृष्ण-उपासना, ’’शरण’’ सरस श्रृंगार।।