भगवान श्रीराधामाधव


भगवान्‌ श्रीराधामाधव :- श्रीराधामाधव प्रभु श्रीनिम्बार्क वीथि-पथिक रसिक शिरोमणि श्रीजयदेव कवि संसेव्य ठाकुर हैं। वर्तमान श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ में विराजने से पहले बंगाल से आकर व्रजमण्डल में श्रीराधाकुण्ड श्रीनिवासाचार्यजी की बैठक पर विराजते थे। इन्होंने वि0 सं0 1823 में जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्य श्रीगोविन्दारणदेवाचार्यजी महाराज को स्वप्न में आदेश दिया था कि हमें पुष्करक्षेत्रस्थ श्रीआचार्यपीठ, सलेमाबाद ले चलो, आचार्यश्री ने पूछा-कैसे:किस प्रकार से ले चलें ? तब श्रीमाधवजी ने कहा कि अपने रथ में बिठा ले चलो। प्रभु की आज्ञा के अनुसार रथ में विराजमान करके प्रस्थान किया। पीछे से श्रीराधाकुण्ड के व्रजवासी और बंगाली भक्तों ने विचार किया कि भगवान्‌ को व्रज से बाहर नहीं ले जाने देना चाहिए। वे सबके सब संगठित होकर चलें। रथ भरतपुर पहुंचा, वहां सेवा हो रही थी, पीछे से आये हुए नर नारियों ने आचार्यश्री से प्रार्थना की ‘‘श्रीमाधव भगवान्‌‘‘ व्रज में ही विराजें, बाहर न पधारे। भरतपुर नरेश से भी अनुरोध किया गया। नरेश को विवास था कि-आचार्यश्री को प्रभु का आदेश हुआ हैं स्वयं वे अपनी इच्छा से पधार रहे हैं। उनकी इच्छा के विरूद्ध कुछ भी नहीं हो सकता। यह चित्त में निचित करके भरतपुर नरो ने निर्णय दिया कि आप सब रथ को खींचकर ले जाईये, यदि माधवजी की इच्छा होगी तो वे पुन: वृन्दावन पधार जयेंगे। अगर आप से रथ न चले और आचार्यश्री के घोड़े भी रथ न खींच सके तो श्रीमाधवजी यहां भरतपुर में विराजेंगे। सैंकड़ौं व्रजवासियों ने रथ को खींचा, खूब जोर लगाया, परन्तु वह रथ अत्यन्त बल लगाये जाने पर तलिनक भी न हिल सका। फिर जब आचार्यश्री के घोड़े जुतवायें और और आचार्यश्री ने प्रार्थना की तो वह रथ चल पड़ा। सभी दर्शक चकित हो गये, जय जयकार की ध्वनि से गगन गूंज उठा। वि0 सं0 1823 ज्येष्ठ शुक्ल 4 का वह दिन भरतपुर और व्रजमण्डलके उपस्थित सभी नर-नारियों के दय पटल पर बहुत दिनों तक अंकित रहा। इस घटना का उल्लेख कृष्णगढ़ राज्य के इतिहास रजिस्टरों में जयमाल कवि ने भी किया है। आचार्यपीठ-सलेमाबाद के मार्ग में जितने भी नगर आये, उनके नागरिकों ने श्रीमाधव प्रभु और आचार्यचरणों का हार्दिक स्वागत किया। क्‌ष्णगढ़ के नरेन्द्र ग्रामों की जनता के हर्ष का तो पारावार ही नहीं रहा। पुनीत दिवस ज्येष्ठ शुक्ल 10 को बड़े समारोहपूर्वक श्रीसर्वेवर प्रभु के सन्निकट श्रीमाधवजी विराजमान हुए।
वि0 सं0 1860 के लगभग दो में अराजकता छाई हुई थी। मुस्लिम शासन कमजोर हो चुका था। अंग्रेज शनै: शनै: दो को हथिया रहे थे। कई शक्तिशाली फौजी लूट मार कर रहे थे। ऐसी स्थिति में वि0 सं0 1868 में श्रीमाधवजी रूपनगढ़ के किले में पधराये गये। आचार्यपीठ के विशाल मन्दिर को यवनों लुटेरों ने ध्वंस कर डाला, तब कुछ दिनों बाद संगमरमर का नया मन्दिर बना। जोधपुर नरो की ओर से मकराना से संगमरमर पत्थर भेंट रूप में अर्पित हुआ। वि0 सं0 1872 में श्रीमाधवजी रूपनगढ़ से आचार्यपीठ पधारे, उसी समय श्रीकिशोरीजी की प्रतिमा की प्रतिष्ठा कराई गई तब से श्रीराधामाधवजी अचल रूप से आचार्यपीठ-सलेमाबाद में विराजमान है। ऐसी अद्भुत छवि को शायद ही कहीं अन्यत्र र्दान मिल सके। प्रेमीजन श्रीराधामाधवजी के र्दान कर तृप्त हो जाते हैं।