html lang="en"> श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ-अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ निम्बार्क-तीर्थ सलेमाबाद, अजमेर, राजस्थान


जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ प्रवेश-द्वार

श्रीनिम्बार्क-तीर्थ, सलेमाबाद


आचार्यपीठ :- जहाँ पर लगभग 500 वर्ष पूर्व भयंकर जंगल था। जिसमें कई तरह के हिंसक जानवर रहते थे। इसी जंगल में एक सुन्दर आश्रम भी था। जिसमें साधु सन्त निवास करते थे। इन सन्तों को एक दुष्ट फकीर मस्तिंगशाह ने यहॉ से भगाकर इस आश्रम पर अपना अधिकार जमा लिया। तथा बाद में यहाँ से होकर गुजरने वाले तीर्थ यात्रियों को तंग करने लगा। उस समय इस मार्ग से काफी तीर्थ यात्री पुष्कर एवं द्वारका जाते थे, क्योंकि इन दोनो धामों को जाने का यह एक मुख्य मार्ग था। एक बार उस दुष्ट फकीर ने इस मार्ग से गुजरने वाले सन्तों के एक दल को अपनी करतूतों से कष्ट पहॅुचाना शुरु कर दिया। यहा से सन्त किसी प्रकार बचकर मथुरा में श्री हरिव्यास देवाचार्य जी महाराज के पास पहुचे तथा वहा पहुचकर उन्होनें अपने साथ घटित घटना के बारे में उन्हें जानकारी दी तथा इस स्थान को दुष्ट फकीर मस्तिंगशाह से मुक्त कराने की प्रार्थना की। महाराज श्री को उस दुष्ट के कृत्यों के बारे में जानकर काफी दु:ख पहुचा। तब उन्होनें अपने प्रिय शिष्य श्री परशुराम देवाचार्य जी को उस फकीर को भगा कर धर्म प्रेमी जनता को निर्भय कर वैष्णव धर्म प्रचार की आज्ञा प्रदान की। तब श्री परशुराम देवाचार्य जी ने गुरु के चरणों की वंदना कर उनकी आज्ञानुसार पुष्कर परिक्षेत्र के श्रीनिम्बार्कतीर्थ में रह रहे दुष्ट फकीर की सिद्धियों को नष्ट कर यहा से भागने पर विवश कर दिया। तथा श्रीनिम्बार्कतीर्थ एवं यहा से गुजरने वाले तीर्थ यात्रियों को भय मुक्त कर दिया। इस फकीर की कब्र आज भी आचार्य पीठ से दक्षिण दिशा में बगीची वाले बालाजी के मन्दिर के पास विद्यमान है।
इसके पचात्‌ श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज ने अपने गुरु श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी की आज्ञा पाकर इस स्थान पर आचार्य पीठ की स्थापना की। इन्ही श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के साथ जुड़ी एक घटना से इस स्थान का नाम श्रीनिम्बार्कतीर्थ के साथ-साथ सलेमाबाद भी रख दिया गया। वो घटना इस कार है :-
बादशाह शेरशाह सूरी के कोई पुत्र नहीं था। अत: बादशाह एक बार पुत्र प्राप्ति की कामना से अजमेर स्थित विश्व सिद्ध ख्वाजा माइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आया हुआ था। परन्तु बादशाह को विभिन्न उपायों के बाद भी पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हुई। इस कारण वह बहुत निराश था। उसकी इसी निराशा को देखते हुये, उसकी ही सेना के सेनापति जोधपुर राज्य के खेजड़ला ग्राम के ठाकुर श्री शियोजी भाटी जो स्वयं श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के शिष्य थे। उन्होंने शेरशाह सूरी से निवेदन किया कि यदि आप एक बार मेरे गुरुश्री के दर्शन करें तो आपको अवश्य ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हो सकती है, ऐसा मेरा विश्वास है। ठाकुर साहब ने बादशाह सलामत को बताया कि आचार्य श्री यहॉ अजमेर से मात्र दस कोस की दूरी पर ही स्थित श्रीनिम्बार्कतीर्थ में निवास करते हुये श्रीसर्वेश्वर प्रभु की आराधना करते हैं। शेरशाह सूरी ने श्री शियोजी के विश्वास एवं पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा के कारण श्रीनिम्बार्कतीर्थ चलने का आमन्त्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया, तथा यहाँ आकर आचार्य श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के दर्शन प्राप्त किये। बादशाह शेरशाह सूरी ने आचार्य श्री के चरणों में प्रणाम कर एक स्वर्ण-रत्न जड़ित कीमती दुशाला भेंट किया। आचार्य श्री ने निर्विकार भाव से उस बहुमूल्य दुशाले को अपने चिमटे से उठाकर अपने सामने ज्वलित हवन कुण्ड़ धूनी में डाल दिया। जब बादशाह ने अपने भेंट किये हुये दुशाले को जलता हुआ देखा तो उसके मन में कई प्रकार के विचार उत्पन्न होने लगे। आचार्य श्री ने जब बादशाह के मन के विचाराेें को अपने योग बल से जाना क्योंकि आप श्री तो अन्तर्यामी थे तो आपने उसी चिमटे से हवन कुण्ड़ में से उसी प्रकार के स्वर्ण-रत्न जड़ित विभि प्रकार के दुाशालों का ढ़ेर बादशाह के सामने लगा दिया और बादशाह से कहा इसमे से तेरा जो भी दुशाला हो उसे उठा ले। हमारा तो खजाना यही हवन कुण्ड़ है, जो आता है, हम तो इसी में रख देते है। तू दु:खी मत हो । यह चमत्कारी घटना देखकर शेरशाह सूरी श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के चरणों में गिर पड़ा एवं अपनी गलत भावनाओं के लिये क्षमायाचना करने लगा। तत्पचात्‌ आचार्यश्री ने बादशाह की प्रार्थना पर सर्वेश्वर प्रभु का स्मरण कर पुत्र रत्न प्राप्त होने का आशीर्वाद प्रदान किया। समय आने पर बादशाह को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तथा उसका नाम सलीम शाह रखा गया। पुत्र प्राप्ति के बाद बादशाह एक बार पुन: अपने लाव-लश्कर के साथ विभिन्न प्रकार की भेंटे लेकर श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के चरणों में आया। उसने आचार्य श्री के चरणों में बहुत सारे हीरे, जवाहरात एवं स्वर्ण मुद्रायें रख दी। परन्तु महाराज श्री ने उनमें से एक भी वस्तु स्वीकार नही की। तब एक बार फिर बादशाह को अपनी तुच्छता का अहसास हुआ। अन्त में उसने आचार्य श्री के चरणों में अपना सिर रख कर यहा पर एक ग्राम निर्माण की आज्ञा प्रदान करने की प्रार्थना की तथा उस ग्राम का नाम अपने पुत्र सलीम शाह के नाम पर रखने की स्वीकृति चाही। आचार्य श्री ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। तब से इस ग्राम का नाम श्रीनिम्बार्कतीर्थ के साथ-साथ सलेमाबाद भी पड़ गया।
इसके बाद बादशाह ने जाते-जाते इस क्षेत्र की लगभग छ: हजार बीघा जमीन गायों के चरने के लिये आचार्य पीठ को समर्पित कर दी। इसके प्रमाण स्वरूप बादशाह ने ताम्रपत्र प्रदान किया जो आज भी आचार्य पीठ में सुरक्षित है।

विशेष :- राजस्थान में समय-समय पर राजस्थान की देशी रियासतों के अनेक राजाओ ने भी इस सम्प्रदाय के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की। जयपुर नरेश जगत सिंह ने संवत्‌ 1856 में सलेमाबाद आकर आचार्य श्री का आशीर्वाद प्राप्त किया जिसके फलस्वरुप राजकुमार जयसिंह का जन्म हुआ, अत: इस उन्होंने उन्नीसवीं सदी में इस संप्रदाय को बहुत श्रय दिया और अनेक मेले आयोजित किये इसका उल्लेख इतिहास में मिलता है।

श्रीराधा-माधव मन्दिर :- इस मन्दिर का निर्माण वि0 सं0 1520 के लगभग अनन्त श्री विभूषित जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य पीठाधीवर श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के निर्देशानुसार जोधपुर राज्य के खेजड़ला ग्राम के सरदार श्री शियोजी भाटी एवं श्री गोपाल सिंह जी भाटी के विशेष सहयोग से हुआ। इस मन्दिर का वर्तमान स्वरूप वि0 सं0 1871 में श्रीनिम्बार्काचार्य पीठाधीश्वर शरण देवाचार्य जी महाराज के समय में आया। इस मन्दिर में गीत-गोविन्दकार रससिद्ध संस्त कवि श्री जयदेव द्वारा सेवित श्रीराधा-माधव जी की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके साथ ही यहाँ पर श्री गोकुल चन्द्रमा जी एवं श्री बांकेबिहारी जी के दर्शन है, तथा आचार्य पंचायतन के भी सुन्दर दर्शन है।

राधमाधव दरा यह, सेवित कवि जयदेव।
उत्सव-महोत्सव नित प्रति, ’’शरण’’ प्रभु सेव।।

श्रीसर्वेश्वर प्रभु :- श्रीसनकादि संसेव्य परमाराध्य श्रीसर्वेश्वर भगवान्‌ गुंजाफल सदृा अति सूक्ष्म श्रीशालिग्राम स्वरूप श्रीविग्रह हैं। इसके चारों ओर गोलाकार दक्षिणावर्तचक्र और किरणें बडी ही तेजपूर्ण एवं मनोहर प्रतीत होती हैं। मध्य भाग में एक बिन्दु है और उस बिन्दु के मध्य भाग में युगल सरकार श्रीराघकृष्ण के सूक्ष्म दर्शन स्वरूप दो बडी रेखायें हैं। जो सूर्य के प्रकाश में कभी किसी भाग्यााली सज्जन को ही दिखाई पडती है। यह सर्वेश्वर भगवान्‌ की प्रतिमा श्रीसनकादिकों ने देवर्षि श्रीनारदजी को प्रदान की थी और श्रीनारदजी ने भगवान्‌ श्रीनिम्बार्क को प्रदान की। इस तरह यह श्रीसर्वेश्वर भगवान्‌ की शालिग्राम प्रतिमा क्रमा: परम्परागत अद्यावधि अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ, निम्बार्कतीर्थ सलेमाबाद में विराजमान है। विश्व में इतनी प्राचीन एवं सूक्ष्म चमत्कारपूर्ण श्रीशालिग्राम मूर्ति और कहीं पर भी नहीं हैं। जब श्रीआचार्यचरण धर्म प्रचार अथवा किन्हीं भक्तजनों के परमाग्रह पर यत्र तत्र पधारते हैं, तब यही श्रीसर्वेश्वर प्रभु की सेवा साथ रहती है। श्रीसर्वेश्वर भगवान्‌ निम्बार्क सम्प्रदाय के परमोपास्य इष्टदेव है। श्रीनिम्बार्काचार्य में परमनिधि श्रीसर्वेश्वर प्रभु के दर्शन मात्र से समस्त पातक दूर होते हैं। इसी कारण श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के भक्तजनों में परस्पर मिलने पर जय श्रीसर्वेश्वर बोलने की प्रणाली सदा से चली आरही है। यह प्रतिमा अत्यन्त प्राचीन है। जिसके बारे में कई पुराणों एवं उपनिषदो में वर्णन मिलता है। जैसे माण्डूक्योपनिषद के मन्त्र में भगवान्‌ सर्वेश्वर श्रीहरि की महिमा का वर्णन करते हुये लिखा गया है :-

एष सर्वेश्वर सर्वज्ञ एषोन्तर्याम्येष:।
योनि: सर्वस्य प्रभवाप्ययौहि भूतानाम्‌।।

अर्थात्‌ :-यह सर्वेश्वर भगवान्‌ सर्वज्ञ है। यह प्राणी मात्र अर्थात्‌ चराचर जगत्‌ में अन्तर्यामी रूप से व्याप्त हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ का यह कारण है। प्राणियों की उत्पा, उनका पालन और समय पूर्ण होने पर उनका संहार भी उन्हीं सर्वेश्वर श्रीहरि के द्वारा होता हैं।

श्रीसर्वेश्वर प्रभु सलेमाबाद में किस प्रकार पधारे, इस बारे में कथा इस प्रकार है- एक बार जब ब्रह्मा जी ने सनकादिक ऋषियों से कहा कि वे भगवान्‌ की पूजा करें तो सनकादिक ऋषियों ने ब्रह्मा जी से पूछा कि वे किस भगवान्‌ की पूजा करें। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें सूचित किया कि वे गण्डकी नदी के उद्गम स्थल पर स्थित दामोदर कुण्ड जो कि वर्तमान में नेपाल में मुनािरायण धाम से आगे स्थित हैं पर जायें, जहा तुलसी पत्र पर भगवान्‌ विष्णु का प्रतिरूप प्राप्त होगा। आप उसी की पूजा करें। इसके पचात्‌ सनकादि ऋषि दामोदर कुण्ड गये तो वहा उन्हें तुलसी पत्र पर भगवान्‌ विष्णु के प्रतिरूप श्री शालग्राम प्राप्त हुये। इनका नाम श्री सर्वेश्वर प्रभु रखा गया। तथा इस श्रीविग्रह की श्रीसनकादिको द्वारा पूजा अर्चना की गई।

गौर-यामावभासं तं सूक्ष्मदिव्यमनोहरम्‌।
वन्दे सर्वेश्वरं देवं श्रीसनकादिसेवितम्‌।।

अर्थात्‌ :- गौर और याम इन दो बिन्दुओं से सुाशेभित, यामल विग्रह, सूक्ष्माकार, दिव्य मनोहर उन शालग्राम स्वरूप श्रीसर्वेश्वर प्रभु की मैं वन्दना करता हू। जिनकी आराधना-पूजा महर्षि सनकादिक एवं देवर्षि नारद ने भी की थी।

यही श्रीविग्रह श्री सनकादिको ने देवर्षि नारद जी को दान किया था। नारद जी ने यही श्रीविग्रह भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य जी को दान किया था। तब से ही परम्परानुसार यह श्रीविग्रह श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ, श्रीनिम्बार्कतीर्थ सलेमाबाद में विराजमान है। इसका प्रमाण हमें श्रीनिम्बार्कपादपीठाधीवर जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्य पीठाधीश्वर शरण देवाचार्यजी महाराज द्वारा स्वरचित ’’श्रीसर्वेश्वर प्रपा स्तोत्र’’ के प्रथम लाेक में मिलता है।
’’कृष्णं सर्वेश्वरं देवमस्माकं कुलदैवतम्‌’’
अर्थत्‌ :- श्रीसर्वेश्वर प्रभु हमारे कुलदेव है अर्थात्‌ परम्परागत ठाकुर है।
वर्तमान श्रीनिम्बार्कपादपीठाधीवर जगद्गुरु श्रीराधासर्वेश्वरारण देवाचार्यजी महाराज ने भी इस बारे में लिखा है :-
श्रीसनकादिक सेव्य हैं, श्रीसर्वेश्वर देव।
परम्परागत प्राप्त हैं, ’’शरण’’ लसत प्रभु सेव।।1।।
सर्वेश्वर प्रभु अर्चना, सुरर्षि नारद प्राप्त।
सनकादिक सेवित प्रभु, ’’शरण’’ निम्बार्क आप्त।।2।।
श्रीसर्वेश्वर प्रभु श्री शालग्राम का यह श्रीविग्रह इतना सूक्ष्म है, कि इनके दर्शन करने के लिये आवर्धक लेन्स की आवयकता पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान्‌ श्री शालिग्राम का स्वरूप जितना ज्यादा सूक्ष्म होता है उसके पूजन का उतना ही महत्व अधिक होता है। पद्मपुराण में भी इसके बारे में वर्णन मिलता है :-
तत्राप्यामलकीतुल्या पूज्या सूक्ष्मैव या भवेत्‌।
यथा यथा ालासूक्ष्मा तथास्यास्तु महत्फलम्‌।।
अर्थात्‌ - आंवले के बराबर श्री शालिग्राम की मूर्ति पूजा में हो तो उसका बड़ा भारी फल है और यदि उससे भी ज्यों-ज्यों सूक्ष्म मूर्ति प्राप्त हो त्यों-त्यों और भी अधिक फल देने वाली होती है। प्रभु कृपा से आचार्य पीठ में विराजित श्री शालग्राम का श्रीविग्रह तो गुंजाफल चिरमी के ही बराबर है। इन सबके अतिरि सूक्ष्मतम श्री शालग्राम श्रीविग्रह की एक और विशेषता है कि इस श्रीविग्रह में एक गोलाकार च दिखलाई देता और उस च के मध्य भाग में दो बिन्दु दिखाई देते है। ये दोनों बिन्दु भगवान्‌ श्रीराधाकृष्ण के प्रतीक है। ऐसा सुन्दर एवं सूक्ष्मतम श्री शालग्राम श्रीविग्रह विव में और कहीं नही मिलता है। आचार्य श्री जब भी धर्म चारार्थ कहीं भी पधारते है, तब श्रीविग्रह को गले में धारण करके अपने साथ ही ले जाते हैं। जिसके दर्शन मात्र से इस भव के कई कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।
श्रीनालाजी :- मन्दिर के मुख्य द्वार के दक्षिण दााि में श्रीनालाजी के दर्शन होते है। यहा पर स्वामी जी श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के अभिषेक का जल प्रवाहित होता था। इस जल का उपयोग भ अपने रोग-दोष को ाान्त करने के लिये करते थे। इसके प्रमाण स्वरूप आचार्य पीठ में रखे हुये बहुत से पत्र है, जिसमें दूर-दूर के राजा-महाराजा और भक्तों ने नालाजी का जल व स्वामी जी की धुनी अग्निकुण्ड की भस्म को श्रीसर्वेश्वर प्रभु के प्रसाद एवं तुलसी दल सहित भिजवाने की प्रप्रार्थना की है।
मन्दिर की विशेषतायें :- इस मन्दिर को बाहर से देखनें पर यह किले की तरह दिखाई देता है। यह मन्दिर 42 हजार वर्ग फुट में बना हुआ है। मन्दिर के चारों ओर 35 फुट šचा एवं 6 फुट चौड़ा परकोटा बना हुआ है। मन्दिर के गर्भगृह की लम्बाई 30 फुट एवं चैाड़ाई 14 फुट है। मन्दिर के अन्दर बहुत ही सुन्दर काच की नक्काशी की हुई है, जो बरबस ही मन को आकर्षित कर लेती है। आचार्य मन्दिर में वेद मन्दिर भी है, जहा चारों वेद एक साथ रखे गये है। मन्दिर के बड़े चौक में दोनों ओर मा: श्रीभगवत्‌ पार्षद रूप श्री हनुमान जी एवं श्री गरुड़ जी के दिव्य स्वरूप सुशोभित है। इनके अतिरिक्त भी मन्दिर में और कई विशेषताऐं है,जो निम्न है:-
1 यह मन्दिर इस तरह बना हुआ, कि मन्दिर के मुख्य द्वार के अन्दर पहूँचते ही भगवान श्रीराधा-माधव के दर्शन होते है।
2 मुख्य मन्दिर इस तरह बना हुआ है, कि शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि को चन्द्रमा की चांदनी भगवान्‌ के चरणारविन्दों में पहूँचती है। ऐसी अनुपम छटा आपको अन्यत्र कहीं भी देखने को नही मिलेगी।
3 मुख्य मन्दिर के जगमोहन राधा-माधव के सामने का स्थान में उच्च कोटी के संगमरमर के ऐसे कलात्मक खम्भे लगे हुये जो मध्य भाग में पारर्दाशी है।
इस कार यह मन्दिर धार्मिकता के साथ-साथ कलात्मकता एवं प्राचीनता लिये हुये वाेिष रूप से पूजनीय एवं दर्शनीय है।
मन्दिर के खुलने एवं बन्द होने का समय :-
खुलने का समय- ग्रीष्मकाल - प्रात: 5-30 बजे एवं सांयकाल 5-00 बजे।
शीतकाल - प्रात: 6-00 बजे एवं सांयकाल 4-30 बजे।
बन्द होने का समय-ग्रीष्मकाल - दोपहर 12-00 बजे एवं रात्री 9-00 बजे ।
शीतकाल - दोपहर 12-30 बजे एवं रात्रि 7-30 बजे ।
मन्दिर में होने वाली आरतियों का समय-

  आरती ग्रीष्माकालीन शीतकालीन
1 मंगला प्रात: 5-30 बजे प्रात: 6-30 बजे
2 श्रृंगार प्रात: 9-00 बजे प्रात: 9-30 बजे
3 राजभोग दोपहर 12-00 बजे दोपहर 12-30 बजे
4 सन्ध्या सांय 7-00 बजे सांय 6-00 बजे
5 शयन रात्रि 8-30 बजे रात्रि 8-00 बजे