आचार्य-परंपरा


श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय आचार्य परम्परा :-
वैष्णव चतु: सम्प्रदायों में श्रीनिमबार्क-सम्प्रदाय अति प्राचीन सम्प्रदाय है। इसका प्रदुर्भाव श्रीब्रह्मा के मानस पुत्र श्रीसनकादि-महर्षियों से होता है। जैसाकि द्रष्टव्य है--
सनक: श्रीब्रह्मा रुद्र सम्प्रदायचतुष्टयम्‌
सनकादि मुनिजन, श्री(लक्ष्मी), ब्रह्मा और भ्गवान्‌ ष्कंर ये ही चारों वैष्णव चतु:सम्प्रदाय के प्रवर्तक हैं। इस सम्प्रदाय की आचार्य परम्परा श्रीहंस भगवान्‌ से प्रारम्भ होती है। श्रीहंस भगवान्‌ ने सनकादिकों के प्रष्न का समाधान कर उन्हें वैष्णवी दीक्षा प्रदान की। उपासना में श्रीसर्वेष्वर ष्शालग्राम भगवान्‌ की सेवा-पूजा करने की आज्ञा प्रदान की थी। वह शुभ दिन युगादि तिथि कार्तिक शुक्ला नवमी (अक्षय नवमी) हंस भगवान्‌ के अवतार का मुख्य उद्देष्य था, श्रीसनकादिकों के प्रष्न का समाधन कर उन्हें वैष्णवी दीक्षा प्रदान करना! अत: कार्तिक शुक्ला नवमी (अक्षय नवमी) श्रीहंस-सनकादि जयन्ती तथा श्रीसर्वेष्वर जयन्ती तथा श्रीसर्वेष्वर भगवान्‌ का प्राकट्‌य दिवस भी उसी दिन मनाया जाता है।
श्रीहंस-सनकादिक का यह प्रसंग श्रीद्भागवत (एकादष स्कन्ध 13 श्लोक संख्या 16 से श्लोक सं0 42 तक) में वर्णित है।
श्रीहंस भगवान्‌ के षिष्य सनकादि मुनिजन हैं और श्रीसनकादिकों के षिष्य देवर्षि नारद तथा श्रीनारद के षिष्य है श्रीचक्रसुदर्षनावतार आद्याचार्य जगद्गुरु भगवान्‌ श्रीनिम्बार्कमहामुनीन्द्र।
श्रीहंस भगवान्‌, श्रीसनकादि मुनिजन तथा देवर्षि श्रीनारद ये तीनों तो देवस्वरूप में है। अत: प्राय: करके कई सम्प्रदायों की परम्परा में इनका नाम आजाता है, किन्तु इनके पष्चात्‌ श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ आचार्यरूप में इस भूतल पर प्रकट हुए थे, अत: यह सम्प्रदाय श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के नाम से लोक प्रसिद्ध हुआ।
भगवान्‌ श्रीनिम्बार्क महामुनीन्द्र का प्राकट्‌य युधिष्ठर शके 6 में दक्षिण भारत के मूंगी-पैठन में गोदावरी तटवर्ती अरुणाश्रम में हुआ था। आपके पिता का नाम श्रीअरुण मुनि और माताश्री का नाम जयन्ती देवी था। जन्मकालीन नाम श्रीनियमानन्द था! ’’न्हि वैष्णवता कुत्र सम्प्रदाय-पुरस्सरा’’ श्रीमद्भागवत माहात्म्य में इस श्रीनारदोक्त वचनानुसार द्वापर के अन्त में जब वैष्णव धर्म का ह्रास होने लगा, तब भक्तजनों की करुणा भरी पुकार पर भगदादेष पाकर श्रीचक्रराज सुदर्षनजी ने ही नियमानन्द के रूप में अवतार लिया। इनकी समय समीक्षा तथा श्रीनियमानन्द से ’श्रीनिम्बार्क’ नाम से व्यवहृत करने का इतिहास उनके चरित्र में यथास्थान परिवर्णित है।
1-श्रीहंस भगवान्‌
अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक, करुणावरुणालय, सर्वान्तर्यामी, सर्वष्क्तिमान्‌, सर्वाधार श्रीहरि के मुख्य 24 अवतारों में श्रीहंस भगवान्‌ भी एक अवतार है। आपका अवतार सत्ययुग के प्रारम्भ काल में युगादि तिथि कार्तिक शुक्ला नवमी (अक्षय नवमी) को माना जाता है। आपके अवतार का मुख्य प्रयोजन यही मान्य है कि एक बार श्रीसनकादि महर्षियों ने पितामह श्रीब्रह्मा महाराज से प्रष्न किया कि-पितामह ! जबकि चित्त और विषयों का परित्याग कैसे करें । यह चित्तवृत्ति-निरोधात्मक गम्भीर प्रष्न जब ब्रह्माजी के समक्ष आया तब महादेव ब्रह्म ने भगवान्‌ श्रीहरि का ध्यान किया। इस प्रकार ब्रह्माजी की विनीत प्रार्थना पर ‘‘ऊर्जे सिते नवम्यां वै हंसो जात: स्वयं हरि:’’ कार्तिक शुक्ला नवमी को स्वयं भगवान्‌ श्रीहरि ने हंसरूप में अवतार लिया! भगवान्‌ ने हंसरूप इसलिए धारण किया कि जिस प्रकार हंस नीर-क्षीर (जल और दूध) को पृथक्‌ करने में समर्थ हैं, उसी प्रकार आपने भी नीर-क्षीर विभागवत्‌ चित्त और गुणत्रय का पूर्ण विवेचन कर परमोत्कृष्ट दिव्य तत्व के साथ-साथ पंचपदी ब्रह्मविद्या श्रीमन्त्रराज का सनकादि महर्षियों को सदुपदेष उनके सन्देह की निवृत्ति की। यह प्रसंग श्रीमद्भागवत के एकादष स्कन्ध अध्याय 13 में श्रीकृष्णोद्धव संवादरूप से विस्तारपूर्वक वर्णित हैं।
2-सनकादि महर्षि
भगवत्परायण, बाल-ब्रह्मचारी, सिद्धजन, तपोमूर्ति ये चारों भ्राता सृष्टिकर्ता श्रीब्रह्मदेव के मानस पुत्र हैं। इन चारों के नाम हैं-सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार। इनके उत्पन्न होते ही श्रीब्रह्माजी ने इनको सृष्टि विस्तार की आज्ञा दी पर इन्होंने प्रवृत्ति मार्ग को बन्धन जानकर परम श्रेष्ठ निवृत्ति मार्ग को ही ग्रहण किया। इन महर्षियों ने श्रीहंस भगवान्‌ द्वारा कार्तिक शुक्ल नवमी को वैष्णवी पंचपदी ब्रह्मविद्या श्रीगोपाल मन्त्रराज की दीक्षा संप्राप्त कर लोक में निवृत्ति धर्म कर प्रचार-प्रसार किया। अत: ये लोकाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हैं। श्रीसनकादि मुनिजन निवृत्ति धर्म एवं मोक्ष मार्ग के प्रधान आचार्य है। पूर्वजों के पूर्वज होते हुये भी सदा ही पॉंच वर्ष की अवस्था में रहकर भगवद्भजन में ही संलग्न रहते हैं। श्रीसर्वेष्वर प्रभु इन्हीं के संसेव्य ठाकुर हैं, भगवान्‌ द्वारा श्रीगोपाल मन्त्रराज का सतत अनुष्ठान करना परम लक्ष्य है जैसे--
यह अष्टादषाक्षर श्रीगोपाल मन्त्रराज श्रीहंसरूप नारायण द्वारा श्रीसनकादिकों को प्राप्त हुआ। श्रीसनकादिकों से देवर्षि श्रीनारद को मिला और श्रीनारद द्वारा सुदर्षनचक्रावतार भगवान्‌ श्रीनिम्बार्क को संप्राप्त हुआ। इस प्रकार सम्प्रदाय में यह परम्परागत मन्त्र है। जो ’’गोपालतापिन्युपनिषद्’’ का वैदिक मन्त्र है। इसका वर्णन विभिन्न पुराणों एवं तन्त्रों में भी भली प्रकार उपलब्ध है। श्रीसनकादिकों द्वारा लिख्ी हुई ’’श्रीसनत्कुमार संहिता’’ प्रसिद्ध है। इनका पाटोत्सव (आविर्भाव-दिवस) कार्तिक शुक्ला नवमी को मनाया जाता है।
3-देवर्षि श्रीनारदजी
सुधाकरस्वच्छतनुत्वभाजं, स्वणोर्पवीतित्वमुपैतिवासम। प्रवर्तयन्तं हरिभक्तियोगं, श्रीनारदं तं शरणं व्रजामि।। भक्ति-ज्ञान-वैराग्य प्रभृति समस्त साधनों का समस्त लोक-लोकान्तरों में सर्वत्र उपदेष करते विचरण करने वाले, कीर्तन कला-विषेषज्ञ, वीणाधर देवर्षिवर्य श्रीनारदजी महाराज के नाम को कौन नहीं जानता! आपका परदु:ख दु:खित्व भाव बहुत प्रसिद्ध है। भगवत्कृपा से आपकी सर्वत्र अबाध गति थी। आप सभी जीवों पर समान भाव रखते हुए सबका हित चिन्तन किया करते थे। आपने श्रीहंसवंषावतंस ब्रह्मपुत्र श्रीसनत्कुमारजी से पंचपदी ब्रह्मविद्या अष्टादषाक्षरी श्रीगोपालमन्त्रराज की दीक्षा ब्रहण कर लोक में सर्वत्र वैष्णव धर्म की विजय पताका फहराई। ध्रुव-प्रह्‌लाद आप ही के कृपापात्र थे। दक्ष प्रजापति के हर्यष्व एवं सबलष्व नामक सहस्राधिक पुत्रों को आपने दिव्योपदेष प्रदान कर सृष्टि रचना विषयक कर्म-बन्धन से छुडाकर निवृत्ति-पथ-परायण बनाया। इसी प्रकार प्राचीन बर्हि राजा को भी हिंसात्मक कर्मों की ओर से हटाकर भगवद्भक्ति की ओर प्रवृत्त किया। तात्पर्य यह है कि अहर्निष आपका भगवद्गुणगान तथा परोपकार में ही समय व्यतीत होता था। महर्षि वाल्मीकि तथा श्रीकृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को संक्षिप्त रामचरित एवं चतु:ष्लोकी भागवत का ज्ञान कराकर वाल्मीकि रामायण और श्रीमद्भागवत जैसे अनुपम ग्रन्थों का निर्माण करवाना आप ही का आयोजन था। व्रजमण्डल मेें जाकर श्रीगोवर्धन के समीप श्रीअरुणाश्रम में श्रीचक्रसुदर्षनावतार श्रीनियमानन्द को अपने ही श्रीसनकादि मुनिजनों द्वारा संप्राप्त पंचपदी ब्रह्मविद्या श्रीगोपालमन्त्रराज की दीक्षा प्रदान कर सनकादि संसेव्य भगवान्‌ श्रीसर्वेष्वर प्रभु की सेवा समर्पण की थी। आप सभी शास्त्रों के पूर्ण ज्ञाता थे। श्रीसनकादिकों के पूछने पर आपने बताया था कि-मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, वेदविद्या, भूतविद्या, सर्पविद्या और देवयजन विद्या आदि सभी विद्यायें पढी हैं, फिर भी हे महर्षे ! न जानें क्यों चिन्ताग्रस्त हूॅं। अत: आत्मषान्त्यर्थ आपकी शरण में आया हूॅं। देवर्षि श्रीनारद के इस कथन से हमको यह भी षिक्षा मिलती है कि-श्रीहरिगुरु परायण (षरणागत) हुये बिना अर्थात्‌ भगवद्भक्ति बिना चाहे जितनी विद्यायें पढकर ज्ञानी बन जाय, पर वास्तविक शान्ति प्राप्त नहीं होती। आपके द्वारा रचित अनेक शास्त्रों में ’’श्रीनारद पंचरात्र’’ व ’’श्रीनारद-भक्ति-सूत्र’’ प्रधान है। आपका जयन्ती दिवस (पाटोत्सव) मार्गषीर्ष शुक्ल द्वादषी तिथि माना जाता है।
4-भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य
आपका आविर्भाव युधिष्ठिर शके 6 में कार्तिक शुक्ला 15 को सायंकाल मेष लग्न में हुआ था। जन्म समय चन्द्र, मंगल, बुध,गुरु और शनि ये पॉंच ग्रह उच्च स्थान में थे। माता का नाम श्रीजयन्तीदेवी तथा पिता का नाम श्रीअरुण मुनि था। जन्म-स्थान दक्षिण प्रान्त गोदावरी तटवर्ती श्रीअरुणाश्रम माना जाता हैं। यह स्थान मूंगी-पैठण जि0 अहमदनगर:महा0 में हैं। आपका जन्मकालीन नाम नियमानन्द था। भक्तजनों की करुणाभरी पुकार पर गोलोकविहारी भगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्र ने अपने परम प्रिय आयुध श्रीचक्रसुदर्षनजी को आदेष देते हुए कहा था कि-हे कोटि सूर्य सदृष दिव्य तेजधारी महाबाहो चक्रराज! आप शीघ्र ही भूतल पर अवतरित होकर अज्ञान रूप घोर अन्धकार में डूबे हुए जीवों को वैष्णव धर्म के प्रचार-प्रसार द्वारा भक्ति का पथ-प्रदर्षन कीजिये। इस भगवदादेषानुसार श्रीचक्रराज सुदर्षन ने उपर्युक्त द्रविड देष में बालक नियमानन्द के रूप में अवतार लिया था।
यह निम्बार्क सम्प्रदाय अति प्राचीन है। युधिष्ठिर शके 6 को आज पॉंच हजार वर्षों से अधिक चल रहा हैं। जैसे-धर्मराज युधिष्ठिर शके प्रमाण 3044 वर्ष तत्पष्चात्‌ विक्रम सम्वत्‌ के इस समय 2060 वर्ष इन दोनों का योग मिलाकर 5104 वर्ष होते हैं। अर्थात्‌ विक्रम सं0 2060 में आपके प्राकट्‌य समय को 5098 वर्ष हुए थे जो कि कई स्थानों(ग्रन्थ या व्रतोत्सव-पत्रों) पर श्रीनिम्बार्काब्द के आगे अंकित रहता हैं।
एक बार अपने आश्रम में दिवाभोजी दण्डी महात्मा के रूप में श्रीब्रह्माजी को रात्रि हो जाने पर भोजन करने से निषेध करते देखकर नीमवृक्ष पर अपने तेज-तत्व श्रीसुदर्षनचक्र को आवाहन कर सूर्य रूप में दर्षन कराकर उन्हें भोजन कराया। निम्ब (नीम) के वृक्ष पर अर्क (सूर्य) के दर्षन कराने पर ब्रह्माजी द्वारा आपका नाम श्रीनियमानन्द से निम्बार्क रखा गया और आपके द्वारा प्रसारित सम्प्रदाय को श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध किया। आपने देवर्षि श्रीनारदजी द्वारा इसी स्थान (श्रीगोवर्धन) की उपत्यका अरुणाश्रम वर्तमान श्रीनिम्बग्राम (नीमगॉंव) में पंचपदी ब्रह्मविद्या गोपाल मन्त्रराज की दीक्षा ग्रहण क्र श्रीहंस-सनकादि द्वारा परम्परागत स्वाभाविक द्वैताद्वैत सिद्धान्त और युगलकिषोर श्रीराधाकृष्ण की युगल उपासना का लोक में प्रचार-प्रसार किया। आपका सिद्धान्त और उपासना संक्षिप्त में इस प्रकार है-
श्रीनिम्बार्क सिद्धान्त में तत्वत्रय (ब्रह्म, जीव और प्रकृति) अनन्त और अनादि हैं। ब्रह्म स्वतन्त्र और प्रकृति परतन्त्र (ब्रह्म के अधीन) है। बद्ध, बद्धमुक्त और मुक्त सामान्यत: जीवों के ये तीनों प्रभेद हैं, जो प्रकारान्तर से अनेक हो जाते हैं जो सिद्धान्त शास्त्रों द्वारा जाने जा सकते हैं समस्त चराचर जगत्‌ ब्रह्म का अंष एवं परा-परात्मिका प्रकृति शक्ति होने के कारण सत्य है। जीव प्रकृति रूप से चराचरात्मक सम्पूर्ण विष्व-ब्रह्म से भिन्न हैं, किन्तु उसका अंष एवं शक्ति होने के कारण स्वभावत: अपृथक्‌ सिद्ध अभिन्न भी है। यही स्वाभाविक द्वैताद्वैत (भेदाभेद तथा भिन्नाभिन्न नामक) सिद्धान्त हैं। इस सम्प्रदाय में जीव को सखी भाव द्वारा नित्यकिषोर निकुंजविहारी प्रिया-प्रियतमलाल श्रीराधाकृष्ण की पंचकालानुष्ठान विधि से उपासना करने का विधान हैं! श्रीनित्यनिकुंज में आप रंगदेवी जू कें नाम से सेवा में रहते हैं आपके द्वारा रचित अनेक ग्रन्थों में उपलब्ध ग्रन्थ इस प्रकार है-बादनारायण कृत ब्रह्मसूत्रों पर ’’वेदान्त पारिजात सौरभ’’ नामक भाष्य, वेदान्त दषष्लोकी, मन्त्ररहस्य षोडषी, प्रपन्नकल्पवल्ली, राधाष्टक और प्रात: स्मरणादि स्तोत्र।
5-आचार्य श्रीनिवासाचार्य
ये भगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्र कर-कमलांकित श्रीपांचजन्य शंख के अवतार हैं तथ श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ के प्रमुख षिष्य है। इनका निवास-स्थान व्रजमण्डल में श्रीगोवर्धन के समीप श्रीराधाकुण्ड ललिता संगम पर है! यह स्थान श्रीनिवासाचार्यजी की बैठक के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थान पर आपके चरण-चिह्न हैं, जिनकी नियमित रूप से सेवा-पूजा होती है। आपके शंखावतार होने का प्रमाण आपही के पट्‌टषिष्य श्रीविष्वाचार्यजी महाराज द्वारा निर्मित उपर्युक्त श्लोक में निर्दिष्ट है। आपके द्वारा निर्मित ब्रह्मसूत्रों पर बृहद्भाष्य ’’वेदान्त कौस्तुभ’’ के नाम से सुप्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त और भी अनेक ग्रन्थ हैं, जिनमें केवल ’’लघुस्तवराज’’ मिलता है, अन्य-ख्याति निर्णय, पारिजात सौरभ भाष्य, रहस्य प्रबन्ध, कठोपनिषद् भाष्य आदि अनुपलब्ध हैं। आचार्यरूप में आप श्रीपांचजन्य शंखावतार हैं और निकुंज उपासना में श्रीनव्यवासा (प्रियाप्रियतम श्रीयुगलकिषोर की नित्य सहचरी) के अवतार माने जाते हैं। आपका पाटोत्सव दिवस माघ शुक्ला पंचमी (वसन्त पंचमी) को मनाया जाता हैं।
द्वादष आचार्य एवं अष्टादष भट्‌ट
श्रीनिवासाचार्य से लेकर श्रीदेवाचार्य पर्यन्त इन निमनांकित आचार्यों की ’’द्वादषाचार्य’’ संज्ञा है तथा श्रीसुन्दरभट्‌टाचार्य से लेकर श्रीभटृटाचार्य पर्यन्त अट्‌ठारह भट्‌टों की ’’अष्टादष भट्‌ट’’ संज्ञा हैै
6-श्रीविष्वाचार्य
इनके द्वारा रचित ग्रन्थ हैं, उन ग्रन्थों में ’’श्रीकृष्णस्तवराज’’ इन्हीं की रचना मानी जाती है तथा अन्य ग्रन्थ अनुपलब्ध है। पाटोत्सव फालगुन शुक्ल 4 (चतुर्थी) मान्य है।
7- विवरणकार पुरुषोत्तमाचार्य
इनके भी निर्मित ग्रन्थ अनेक मिलते हैं। उनमें ’’वेदान्त कामधेनु दषष्लोकी’’ पर विस्तृत भाष्य ’’वेदान्तरत्नमंजूषा’’ इनका सुप्रसिद्ध ग्रन्थ है। वेदान्तरत्नमंजूषा की भूमिका में इनका विस्तृत चरित्र उल्लिखित है। पाटोत्सव चैत्र शुक्ला 6 (षष्ठी) का होता है।
8-श्रीविलासाचार्य
आपका जीवनवृत्त आचार्य चरित्र में सक्षिप्त रूप से मिलता है। विद्वानों का अनुमान है कि 25 श्लोकी ’’सविषेष निर्विषेष श्रीकृष्णस्तवराज’’ आपकी ही कृति है। आपका वैषाख शुक्ल अष्टमी को पीठासीन हुए थे! उसी दिन आपका पाटोत्सव मनाया जाता है। सखी भाव की उपासना में आप उच्चकोटि पर पहुॅंचे हुए थे। आप अत्यन्त निरपेक्ष एवं निस्पृही थे! निरन्तर वृन्दावन में ही रहा करते थे।
9-श्रीस्वरूपाचार्य
आपके सम्बन्ध में भी संस्कृत ग्रन्थों में संक्षिप्त ही उल्लेख मिलता है। कहा जाता हे कि आप स्वरूप एवं पर (उपास्य) स्वरूप में ही निरन्तर निमग्न रहते थे। निकुंज उपासना पद्धति से आप ’’सरसा सखी’’ के अवतार हैं। अत: सखी परम्परा में आप सरसा नाम है। आचार्य पीठासीन होते हुए भी आप वृन्दावन से बाहर पर्यटन करने नहीं गये।
10-श्रीमाधवाचार्य
श्रीस्वरूपाचार्य के सिंहासन को आपने अलंकृत किया। आषाढ शुक्ला दषमी को आपका पाटोत्सव मनाया जाता है। यद्यपि आपका रचा हुआ अभी तक कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हुआ है तथापि यह निष्चित है कि आप एक उच्चकोटि के विद्वान्‌ थे। आपका जन्म एक उच्च ब्राह्मण कुल में हुआ था। आपके पिता एक अच्छे राज्य के अधिपति थे, किन्तु आपने उस राज्य को त्याग दिया! गुरुदेव से वैष्णवी दीक्षा प्राप्त कर भजन करने लगे। गुरुदेव के वृन्दावन वास होने पर उनके सिंहासन पर आप विराजे। साधु-सन्तों सहित वृन्दावन से एक बार तीर्थाटन करते हुए काषी पहुॅंचे। यहॉं गोविन्द नाम के बडे गुणग्राही सच्चे जिज्ञासु पच्चीस वर्ष वयस्क एक दण्डी सन्यासी थे। आचार्य का आगमन देखकर-सुनकर वेष बदलकर उनके निकट पहुॅंचे। गेरुआ वस्त्र उतार कर उन्होंने श्वेत वस्त्र पहन लिये। गले में तुलसी की कण्ठी और भाल पर सुन्दर ऊर्ध्वपुण्ड्र लगा लिया आचार्य ने इस भेद को जान लिया और दण्डी से कहा ’’आपने अच्छा किया जो बंधक रूप दण्ड कमण्डल को छोडकर इस निर्बंधन भाव को अपनाया। दण्डी के बडी प्रार्थना की, क्षमा मांगी और कहा ’’प्रभो ! आपने ही आन्तरिक प्रेरण कर मुझसे वेष बदलवाया! अब मुझे आप अपनी शरण में ले लें। मैं आपकी शरण में हूॅं। श्रीमाधवाचार्य ने उन्हें दीक्षा दी। वे ही आगे बलभद्राचार्य हुए। श्रीमाधवाचार्य ने 60 वर्षों तक अवनितल पर श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ को अलंकृत किया। उनके पष्चात्‌ श्रीबलभद्राचार्य पीठासीन हुए। रहस्य परम्परा आपका ’’श्रीमधुराजी’’ नाम है।
11-श्रीबलभद्राचार्य
आपने स्वतन्त्र भक्ति भाव का उपदेष करते हुए 60 वर्षों तक सिंहासन को अलंकृत किया। आपका पाटोत्सव श्रावण शुक्ला तृतीया को मनाया जाता है। आप ऐसे अलौकिक आचार्य हुए, जो अधेिकतर श्रीवृन्दावन में ही रहकर अखण्ड भजन में निरत रहे। कभी किसी विषेष प्रसंग पर ही आप पुष्कर आदि तीर्थों की यात्रा करते थे। कहा जाता है कि आप 60 वर्षों तक आचार्य सिंहासन पर विराजे किन्तु भगवद्भक्ति में इतने निरत रहे कि एक भी गृहस्थ को दीक्षा नहीं दी। श्रीपद्माचार्य आदि अपने षिष्यों को ही मन्त्रोपदेष करने की आज्ञा प्रदान कर दी। आप स्वयं तो श्रीवृन्दावन में ही लेटे रहते। रहस्य (सखी) परम्परा में आपका ‘‘श्रीभद्राजी‘‘ के नाम से स्मरण किया जाता है। अनन्तरामजी ने एक पद्य द्वारा आपकी वन्दना की है
12-श्रीपद्माचार्य
श्रीबलभद्राचार्य के पष्चात्‌ आपने श्रीनिम्बार्कपीठ को अलंकृत किया! आप माथुर (मथुरा के चतुर्वेदी) कुल के दीपक माने जाते हैं। जन्म से ही आप अद्भुत अलौकिक गुण दिखाई देते थे। ज्यों ही किषोरावस्था आई कि आपको संसार से विराग हो गया। 16 वें वर्ष में ही आप श्रीगुरुदेव की शरण में श्रीवृन्दावन आ गये। गुरुदेव के चरणों में गिरकर आपने अपने मनोभाव सुनाये। आचार्य ने जान लिया कि यह अवष्य ही नित्यसिद्ध परिकर में से है। वैष्णव पंच संस्कारों से अलंकृम कर मन्त्रोपदेष दिया। जैसे दीपक से दीपक के जल जाने पर उसका भी वैसा ही प्रकाष हो जाता है, वैसे ही श्रीबलभद्राचार्य के सम्पर्क से आपका प्रकाष पडा। पद्माचार्य नामकरण कर गुरुदेव के चित्त में भी गडी शान्ति हुई। श्रीबलभद्राचार्य किसी गृही (विषयी) को षिष्य नहीं बनाते थे। ऐसे जो जीव शरणागत होते उनको श्रीपद्माचार्य सत्पथ दखाने लगे। आपका ज्ञान, प्रकाष और यष अधेिक से अधिक बढने लगा। गुरुदेव की विद्यमानता में ही आपने आचार्योचित कार्यभार सम्भाल लिया। गुरुदेव के पष्चात्‌ आप चालीस वर्ष तक आचार्य सिंहासनासीन रहे। आपके कई एक ग्रन्थ भी लिखे किन्तु आज वे अनुपलब्ध है। अर्चिरादि पद्धति में आपके द्वारा रचित श्रीवृन्दावन वर्णन का एक श्लोक मिलता है- इससे पता चलता है कि आपके वृन्दावन और युगल उपासना सम्बन्धी विषिष्ट ग्रन्थ की रचना की थी। आपका पाटोत्सव भाद्रपद शुक्ला द्वादषी के दिन मनाया जाता है। आपकी वन्दना के रूप में एक श्लोक श्रीअनन्तरामजी का मिलता है, जिसमें आपके उपरोक्त जीवनवृत्त के भी दर्षन होते हैं।
13-श्रीष्यामाचार्य
आपके जीवन-वृत्तान्त के सम्बन्ध में संस्कृत ग्रन्थों में अत्यन्त सूक्ष्म वर्णन मिलता है। आचार्य चरित्र ‘‘गुरुनति वैजयन्ती‘‘ आदि ग्रन्थों में केवल वन्दना और उसके पाटोत्सव दिवस का परिचय मात्र मिलता है। ग्रन्थों में श्रीकिषोरदासजी ने भी विस्तृत उल्लेख न करके संक्षिप्त ही परिचय दिया है। कहा जाता है कि आपका भी माथुर (चतुर्वेदी) कुल में ही जन्म हुआ था। आप उत्कट विरागवान्‌ थे। किसी भी तनधारी से सम्बन्ध नहीं रखते थे। प्रतिदिन श्रीयमुनाजी ही उन्हें प्रसाद खिलाती थी। किसी से मिलते भी थे तो अनमिल जैसे ही रहते थे। गोकुल में अधिक रहते थे। जब इच्छा होती थी तभी वृन्दावन आ पहुॅंचते थे और निघुवन में निवास किया करते थे यहॉं के क्षण-क्षण में श्रीप्रिया-प्रियतम के अद्भुत अलौकिक लीला-विलासों का प्रकाष देखा करते थे। अत्यन्त विराग के कारण ही आपने किसी प्रकार का संग्रह नहीं किया। इसी से आपकी जीवनी का विषेष परिचय नहीं होता। श्रीअनन्तरामजी के एक श्लोक से भी यही आषय व्यक्त होता है कि आप निरन्तर श्रीष्यामसुन्दर को निहारा करते थे। इसी के गुरु प्रदत्त आपका श्यामाचार्य नाम चरितार्थ हुआ। आपका पाटोत्सव आष्विन शुक्ल त्रयोदषी को मनाया जाता हैं।
14-श्रीगोपालाचार्य
आप एक परम रसिक और बडे सरस हृदय आचार्य थे। कन्नोज आपका जन्म स्थान था और कान्यकुब्ज द्विजकुल में प्रकट हुए थे। आपके माता-पिता परम भागवत थे, किन्तु और सारा परिवार शाक्त था। इनके व्यवहार से वे खिन्न रहा करते थे और प्रभु से प्रार्थना किया करते थे। एक दिन स्वप्न में भगवान्‌ ने उन्हें आदेष दिया कि घबडाओं मत, तुम्हारें पुत्र से एक मेरी विषिष्ट विभूति का अवतार होगा। उसके प्रकट होते ही सब परिवार की वृत्ति परिवर्तित हो जायेगी। थोडे ही दिनों के अनन्तर आपका जन्म हुआ। उसी दिन से परिवार में एक दूसरी लहर पैदा होगई। आपके अंग में विलक्षण चिह्न और एक अद्भुत तेज था। आपकी बारह वर्ष की अवस्था होने तक केवल परिवार ही नहीं, नगर के बहुत से नर-नारी श्रीराधाकृष्ण के भक्त होगये। माता-पिता से फिर किसी प्रकार का विपरीत भाव नहीं करता था। आप माता-पिता की अनुमति लेकर वृन्दावन आये और श्रीष्यामाचार्यजी के दर्षन किये। श्रीष्यामाचार्यजी ने अपना अन्तरंग परिकर समझकर वैष्णवी दीक्षा दी और व्रजयात्रा करने की आज्ञा दी! तदनुसार आप ज्यों ही वृन्दावन से बाहर निकलें, एक विमान दिखाई पडा, उसमें श्रीराधाकृष्ण युगल विराजमान थे। आगे चले तो एक वन में भगवान्‌ के बालरूप के दर्षन हुए। माता-पिता उनका लाड-चाव कर रहे हैं। गाय-बछडे, बैलों के झुण्ड दिखाई दे रहे हैं। आगे चले तो देखा कि भगवान्‌ पौगण्ड रूप में लीला कर रहे हैं। गोवर्धन पहुॅंचे तो वहॉं किषोर रूप में भगवान्‌ के दर्षन हुए। वहॉं अदृभुत कुंजें और लता-पता, तरुवर, सखी-सहेलियॉं और उनकी सभी ऋतुओं की लीलाएॅं देखीं। वापिस वृन्दावन श्रीनिघुवन में आकर श्रीगुरुदेव से सभी लीलाओं का वर्णन किया। फिर गुरुदेव ने श्रीवृन्दावन का रहस्य और अपना पद प्रदान कर अपनी ऐहिक लीला संवरण की। आपका पाटोत्सव भाद्रपद शुक्ला एकादषी को मनाया जाता है। श्रीअनन्तरामजी ने एक वन्दनात्मक पद में संक्षिप्त रूप से आपके चरित्र का दिग्दर्षन कराया है।
15-श्रीकृपाचार्य
आप बड़े प्रतापी आचार्य थे। आपका जीवन वृत्तान्त विषद रूप में उपलब्ध नहीं होता है, तथापि ‘‘सिद्धान्त जाह्नवीकार‘‘ जैसे प्रसिद्ध प्रतापी पट्‌ट षिष्य होने के कारण यह निष्चत होता है कि वे भी अवष्य विषिष्ट तेजस्वी विद्वान्‌ रहे होंगे। श्रीअनन्तरामजी वेदान्तकेषरी ने उन्हें साक्षात्‌ मुकुन्द का ही अवतार बताया है।
श्रीकिषााेरदासजी कृत निजमत सिद्धान्त ग्रन्थ में आपके जन्म स्थल अयोध्या और सारस्वत द्विजकुल का उल्लेख मिलता है। उन्होंने लिखा है कि यज्ञोपवीत होते ही आप अयोध्या से वृन्दावन आ गये। उस समय श्रीगोपालाचार्यजी मान-सरोवर पर विराज रहे थे। ये भी यमुनाजी के दर्षन, स्पर्ष, मज्जन और पान करके वहॉं जा पहुॅंचे। दण्डवत्‌ प्रणाम करके आपने हार्दिक भाव व्यक्त किया। इनका अनुरोध और योग्यता देख आचार्यश्री ने इन्हें पंच संस्कार कर वैष्णवी दीक्षा दी और कृपाचार्य नाम रखा। गुरु की आज्ञानुसार व्रज भ्रमण करके आप वृन्दावन लौटे। फिर समस्त जीवन पर्यन्त वृन्दावन में ही रहे। पाटोत्सव मार्गषीर्ष शुक्ला पूर्णिमा को मनाया जाता है।
16-श्रीदेवाचार्य
श्रीश्रीनिवास आदि द्वादष आचार्यों में आपकी अन्तिम गणना है। आपके ग्रन्थों से आपका प्रकाण्ड पाण्डित्य स्पष्ट अवगत होता है। आपके रचे हुए ग्रन्थों में से ‘‘जाह्नवी‘‘ (ब्रह्मसूत्रों की वृत्ति) दो तरंगों तक उपलब्ध होती है। वह मुद्रित है, शेष अलभ्य। ‘‘भक्तिरत्नांजलि‘‘ (अनन्तराम वेदान्त केषरी के एक श्लोक द्वारा अवगत) भी अप्राप्य है। अमुद्रित प्राचीन संक्षिप्त आचार्य चरित्र में, माघ शुक्ला पंचमी को इनका पाटोत्सव और भगवान्‌ के हस्त कमलाश्रित पद्य का इन्हें अवतार माना है।
17-श्रीसुन्दरभट्‌टाचार्य
श्रीदेवाचार्यजी से इस सम्प्रदाय में दो शाखाएॅं चलती है-एक श्रीसुन्दरभट्‌टाचार्यजी की और दूसरी श्रीव्रजभूषणदेवजी की। श्रीसुन्दरभट्‌टाचार्य ने आचार्य सिंहासन को अलंकृत किया और कई एक ग्रन्थों की रचना की। उससे आपका प्रौढ़ पाण्डित्यक स्पष्टता अवगत होता है। उन ग्रन्थों में केवल तीन ग्रन्थ उपलब्ध है--(1) ‘‘सेतुका‘‘ (सिद्धान्त जाह्नवी की विस्तृत व्याख्या) प्रथम तरंग पर्यन्त लब्ध और मुद्रित, शेष अनुपलब्ध। (2) ‘‘प्रपन्न-सुरतरू-मंजरी‘‘ (प्रपन्न कल्पवल्ली की विस्तृत टीका मुद्रित) (3) ‘‘मन्त्रार्थरहस्य‘‘ (रहस्य षोडषी की व्याख्या)। सेतुका से आपके तीन और ग्रन्थ का पता चलता है--(1) ‘‘गोपालोपनिषद् का भाष्य (2) ‘‘कालनिर्णय सन्दर्भ‘‘ और (3) ‘‘प्रपन्नवृत्तिनिर्णय सन्दर्भ‘‘ ये तीनों ही ग्रन्थ अनुपलब्ध है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि ‘‘पंचकालानुष्ठानमीमांसा‘‘ ही सम्भवत: प्रपन्नवृत्तिनिर्णय होगा या उसका विभाग होगा। श्रीअनन्तरामजी ने एक वन्दनात्मक पद्य द्वारा आपकी विद्वत्ता का दिग्दर्षन कराया है। आपका पाटोत्सव मार्गषीर्ष शु0 द्वितीया को मनाया जाता है। रहस्य परम्परा में आपका ‘‘सुन्दरी‘‘ नाम है।
18-श्रीपद्मनाभ भट्‌टाचार्य
आपका पट्‌टाभिषेक उत्सव वैषाख कृष्णा तृतीया को मनाया जाता है।
जैसे भगवान्‌ के नाभि-कमल से चतुर्मुख ब्रह्माजी का आविर्भाव हुआ था और उनका लोक वेद में पद्मनाभ नाम प्रसिद्ध हुआ, उसी प्रकार आपकी नाभि अर्थात्‌ मुख पद्म द्वारा समन्वय, अविरोध, साधन और फल इस शास्त्रार्थ रूप चतुर्मुख का प्रकाष हुआ । भगवान्‌ के स्वरूप, गुण, शक्ति, विग्रह एवं जीवात्मा, परमात्मा, प्रकृति तथा परमधाम विषयक विचारों को आपने विषेष प्रसार किया। आपके इतिवृत्त का सूक्ष्म रूप परिचय अनन्तरामजी के पद्य से मिलता है। आपकी विद्वत्ता और साधन सम्पन्नता लोक में अपूर्व मानी जाती थी।
19-श्रीउपेन्द्रभट्‌टाचार्य
आपका विक्रम उपेन्द्र (त्रिविक्रम्‌) सदृष था। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति योग के द्वारा आपने भक्त साधकों को लोकपालों, अनेक मन्त्रकारों के सिद्धान्त और तदनुसार प्राप्य लोकाेें से भी ऊर्ध्वलोक (मोक्ष) की प्राप्ति कराई। आपका पाटोत्सव चैत्र कृ0 चतुर्थी को मनाया जाता है।
20-श्रीरामचन्द्र भट्‌टाचार्य
आप भगवद्भक्तियोग के विषिष्ट उपदेष्टा थे। अतएव जिस प्रकार भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र ने सेतु बॉंधकर साधु-सन्त तथा भक्तों को दु:ख देने वाले राक्षसों के सहित रावण को मारकर धर्मत्राण और सज्जनों की रक्षा की, उसी प्रकार भगवद्भक्ति का सेतु बॉंधकर, बोध रूपी वाणों से अनादि पुण्यापुण्यात्मक कर्मरूपी रावण को मारकर अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेष एवं आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक, त्रिविधताप रूपी राक्षसों द्वारा अवरुद्ध जीवों को मुक्त बनाया। आपका पाटोत्सव आचार्य चरित्रानुसार वैषाख शु0 पंचमी को मनाया जाता है।
21-श्रीवामनभट्‌टाचार्य
जैसे कोई सद्धैद्य परदत्त विष को अथवा सर्प काटने पर चढ़े हुए विष को मणिमन्त्र औषधादि द्वारा वमन कराकर रोगी को बचा लेता है, उसी प्रकार श्रीवामनभट्‌टाचार्यजी ने ज्ञान, मन्त्र, वैराग्य और भक्ति आदि औषधियों से शरणागतों के अनादि कर्मात्मक विष की वमन द्वारा निवृत्ति कराई। ऐसे दयालु, परम ज्ञानी और परमगुरु श्रीवामनभट्‌टाचार्यजी महाराज के चरणों की शरण लेना हितकर है। आपका पाटोत्सव ज्येष्ठ कृष्णा षष्ठी को मनाना चाहिए।
22-श्रीकृष्णभट्‌टाचार्य
आचार्य चरित्र में आपका पाटोत्सव आषाढ़ कृष्णा 9 का लिखा है। अनन्तराम ने परम्परा स्तोत्र में आपको भगवान्‌ श्रीकृष्ण की उपमा दी है। जिस प्रकार भगवान्‌ ने मृत गुरु-पुत्रों को लेकर गृरु के अर्पण किया था, उसी प्रकार श्रीकृष्णभट्‌टाचार्यजी ने शरणागतों को मृत्युमुख से बचाकर भगवान्‌ को अर्पित किया।
23-पद्माकरभट्‌टाचार्य
आप बड़े प्रतापी आचार्य हुए थे। ब्रह्मविद्या का आपने इस प्रकार प्रसार किया था, जैसे कई हाथों से धन को बॉंटता हो, इसलिए आपका पद्माकर भट्‌ट नाम चरितार्थ हुआ। ‘‘ब्रह्मविद्या च देवीत्वं‘‘ इस विष्णुपुराण के वचनानुसार ‘‘पद्मा‘‘ ब्रह्मविद्या का भी नाम हैं आपकी वन्दना श्रीअनन्तरामजी की है। आपका पाटोत्सव आषाढ़ कृष्णा अष्टमी को मनाया जाता है।
24-श्रीश्रवणभट्‌टाचार्य
आप श्रीनिम्बार्काचार्य के पष्चात्‌ 20 वें पीठासीन आचार्य हुए हैं। श्रवण, मनन द्वारा आत्म-तत्व का साक्षात्कार कर आपने शरणागतों को श्रवण कराया और अज्ञान अंधकाररूपी अर्गल (कर्मबंधन) से उन्हें मुक्त बनाया। आप निरन्तर शास्त्रानुषीलन में ही संलग्न रहा करते थे। श्रीअनन्तराम वेदान्तकेषरी के एक पद्य से यह प्रमाणित है। आपका पाटोत्सव कार्तिक कृष्णा नवमी को मनाया जाता है। आपके रचे हुए ग्रन्थों का अभी तक पता नहीं चला है।
25-श्रीभूरिभट्‌टाचार्य
श्रीअनन्तराम ने एक पद्य में आपके नाम की सार्थकता दिखलाते हुए कहा हैं कि बहुत से भावुकजनों को अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक श्रीष्यामसुन्दर के धाम का साक्षात्कार कराकर आपने उनका उद्धार किया। आपका पाटोत्सव आष्विन कृष्ण दषमी को मनाया जाता है।
26-श्रीमाधवभट्‌टाचार्य
आपके जीवन-वृत्त के सम्बन्ध में यद्यपि विषेष पता नहीं चलता, तथापि परम्परा प्राप्त आचार्य पीठासीन पूर्वाचार्यों की भॉंति आपकी भी उदारता प्रसिद्ध हैं। वेदान्तकेषरी ने संक्षेप में उनके जीवन का दिग्दर्षन कराते हुए इस प्रकार स्तुति की है। आपका पाटोत्सव कार्तिक कृष्णा एकादषी को मनाया जाता है।
27-श्रीष्यामभट्‌टाचार्य
श्रीमाधवभट्‌टाचार्य की भॉंति ही श्रीष्यामभट्‌टाचार्य एक प्रख्यात आचार्य हुए है, जैसा कि अनन्तरामजी व्यक्त करते है। आचार्य-चरित्र के उल्लेखानुसार प्रतिवर्ष चैत्र कृष्णा द्वादषी को आपका पाटोत्सव मनाया जाता हैं।
28-श्रीगोपालभट्‌टाचार्य
आप जैसे वैदिक धर्म के संरक्षक शरणागतों के पालक, पूर्ण विज्ञानी एवं वैराग्य, दया आदि के समुद्र थे, वैसे ही वत्सलता और क्षमा भी अगाध थी। आचार्य परम्परा स्तोत्र में आपकी स्तुति का एक श्लोक है। आपका पाटोत्सव पौष कृष्णा एकादषी को होता है।
29-श्रीबलभद्रभट्‌टाचार्य
जैसे श्रीबलभद्रजी ने प्रलम्ब दैत्य का वध कर भक्तों का त्राण किया था, वैसे ही आपने आश्रितजनों को कर्मात्मिका अविद्या का निवारण कर उन्हें स्वरूप का ज्ञान कराया, जिससे उनका जीवन सार्थक हुआ। आपके सम्बन्ध में यह एक पद्य है। आपका पाटोत्सव माघ कृष्णा चतुर्दषी को मनाया जाता है।
30-श्रीगोपीनाथभट्‌टाचार्य
श्रीबलभद्रभट्‌टाचार्य के सिंहासन को श्रीगोपीनाथ भट्‌टाचार्य ने अलंकृत किया। शास्त्रीय प्रमाणों से वेद-विरोधियों की शंकाओं का निराकरण कर श्रीगोविन्द का साक्षात्कार कराया। आपकी स्तुति रूप अनन्मरामजी का एक पद्य है। आपका पाटोत्सव श्रावण शुक्ला सप्तमी को मनाया जाता है।
31-श्रीकेषवभट्‌टाचार्य
वेदान्तवेद्य ब्रह्म-षिवादिवन्दित, भगवान्‌ केषव के ही अंषावतार श्रीकेषवभट्‌टाचार्य थे। वेदान्तकेषरी श्रीअनन्तरामजी ने आपके सम्बन्ध में कहा है। आपका पाटोत्सव चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को मनाया जाता है।
32-श्रीगांगलभट्‌टाचार्य
शरणागतजनों के लिए जैसे गंगा को ला रहे हों, इस प्रकार आपकी पुनीत वाण्ी से भावुक भक्त सतृप्त रहा करते हैं। शुद्धहृदय जनों को भगवान्‌ के चरण कमलों तक पहुॅंचाने के लिए, आप साक्षात्‌ जाह्नवी रूप थे। गंगाजी जिस प्रकार इधर-उधर से आये हुए जल को समुद्र तक पहूँ चा देती है, उसी प्रकार आपने भी अनेक जीवों को भगवान्‌ के चरणकमलों की सन्निधि में पहूँचाया। आपकी वन्दना अनन्तरामजी ने इस प्रकार की है--
’’गंगास्पदं चरणपंकजमीष्वरस्य, व्रज्रांकुषष्वजसरोरूहलांछनाढयम्‌।
यो लाति स्वाश्रितजनाय कृपाभियोगात्‌, तं गांगलं च प्रणतो∙स्मि गुरुं हि भट्‌टम्‌।।
आपका पाटोत्सव चैत्र कृष्णा द्वितीया को मनाया जाता हैं।
33-आचार्यवर्य श्रीकेषवकाष्मीरिभट्‌टाचार्य
अनन्तश्रीविभूषित जगद्गुरु निम्बार्काचार्य दिग्विजयी, प्रस्थानत्रयी-भाष्यकार श्रीकेषवकाष्मीरिभट्‌टाचार्य इस आचार्य परम्परा में श्रीहंस भगवान्‌ से 33 वीं संख्या में श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ पर विराजमान थे। आपका आविर्भाव तैलंग देषस्थ वैदूर्यपत्तन, मूंगी-पैठन, श्रीनिम्बार्काचार्यजी की वंष परम्परा में ही हुआ था! आपका स्थितिकाल 13 वीं शताब्दी माना जाता है। आपने भारत-भ्रमण कर कई बार दिग्विजय किया था। काष्मीर में अधिक निवास करने के कारण आपके नाम के साथ ‘‘काष्मीरि‘‘ विषेषण प्रसिद्ध हो गया था। काष्मीर में ही आपने वेदान्त सूत्रों पर ‘‘कौस्तुभ प्रभा‘‘ नामक विषद् भाष्य लिखा और उज्जैन में कुछ दिनों स्थाई निवास कर श्रीमद्भगवद्गीता पर ‘‘तत्व-प्रकाषिका-- नामक टीका लिखी, भागवत में भी लिखी थीं, किन्तु उसमें ‘‘वेद स्तुति‘‘ वाला सन्दर्भ ही उपलब्ध है। इसी प्रकार आपका एक ‘‘क्रम-दीपिका‘‘ नामक ग्रन्थ भी है, जिसमें मन्त्रानुष्ठान का विधि पूर्वक वर्णन हैं! उपनिषदों पर भी आपकी विस्तृत टीका है। आपका पाटोत्सव ज्येष्ठ शुक्ला चतुर्थी को मनाया जाता हैं।
34-आचार्यवर्य श्रीभट्‌टदेवाचार्य
आपका आविर्भाव गौड़ ब्राह्मण कुल में हुआ था। आपके पूज्य माता-पिता मथुरापुरी ध्रुव टीला पर निवास करते थे। आचार्य-परम्परा में श्रीहंस भगवान्‌ से आपश्री 34 वीं संख्या में विद्यमान थे। प्रस्थानत्रयी भाष्यकार जगद्विजयी श्रीकेषवकाष्मीरि जैसे श्रीगुरुदेव तथा महावाणीकार रसिकराजराजेष्वर श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज जैसे षिष्य आपकी दिव्य गरिमा के द्योतक हैं। इसमें आपके प्रखर वैदुष्य तथा दिव्य तप का सहज ही पता लग जाता है। संस्कृत एवं हिन्दी दोनों भाषाओं पर आपका पूर्ण अधिकार था। आपके द्वारा अनेक ग्रन्थ हैं, जिनमें भाषा ग्रन्थ ‘‘श्रीयुगलषतक‘‘ का रसिकजन समाज तथा भक्त समाज में विषेष प्रचार है। यह ग्रन्थ व्रजभाषा की ‘‘आदिवाणी‘‘ नाम से कहा जाता हैं। व्रजभाषा में सर्वप्रथम इसी ग्रन्थ का निर्माण हुआ था। इस ग्रन्थ में श्रीप्रिया-प्रियतम की नित्य:निकुंज लीलाविहार की सुललित रसमयी लीलाओं से सुसम्पन्न सौ पद है। अष्टयाम सेवा और वर्षभर के सभी उत्सवादिकों का अत्यन्त मनोहर रसमय वर्णन है। एक समय श्रीभट्‌टदेवाचार्यजी ने ‘‘भीजत कब देखौ इन नैना‘‘ इत्यादि पद से युगल सरकार का ध्यान किया। ध्यान करते ही तत्काल श्रीप्रभु ने अभिलाषानुसार दर्षन दिये। भगवान्‌ श्रीराधाकृष्ण इनकी गोद में विराजमान रहा करते थे तथा विविध प्रकार की इनके साथ क्रीड़ा किया करते थे! श्रीधामवृन्दावन में आपकी अगाध निष्ठा थी। वे अपने आपको तथा आराध्य देव भगवान्‌ श्रीराधाकृष्ण को श्रीवृन्दावन से बाहर देखने की बात नहीं करते थे। उन्होंने एक पद में यही बताया हैं कि-‘‘धाम निष्ठा की भॅंति वे अपने आराध्यदेव की अनन्य निष्ठा के सम्बन्ध में भी कह रहे हैं। आपका स्थितिकाल 13 वीं शताब्दी का अन्त और 14 वीं शताब्दी का प्रारम्भकाल था। आपने अपने ‘‘श्रीयुगलषतक‘‘ के अंतिम एक दोहे में बताया है। इस ग्रन्थरत्न का रचना काल वि0 सं0 1352 बताया जाता है इनका पाटोत्सव आष्विन शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है।
35-आचार्यवर्य श्रीहरिव्यासदेवाचार्य
आप इस परम्परा में 35 वीं संख्या में आचार्य पीठासीन थे। आपके भी संस्कृत एवं व्रजभाषा में विरचित अनेक ग्रन्थ है। जिनमें ‘‘महावाणी‘‘ प्रधान ग्रन्थ है। यह रस ग्रन्थों में सर्वोत्कृष्ट माना जाता हैं यह महावाणी श्रीभट्‌टदेवाचार्यजी कृत श्रीयुगलषतक का मानों वृहद् भाष्य ही हैं। श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज विषेषत: मथुरापुरी नारद टीला पर निवास किया करते थे। अधिक समय तो आप लोक कल्याण भ्रमण में ही रहा करते थे! भ्रमण काल में वैष्णव धर्म का आपने सर्वाधिक प्रचार-प्रसार किया। सर्वत्र वैष्णव धर्म की विजय वैजयन्ती फहराई।
श्रीसर्वेष्वर प्रभु की राजभोग सेवा के पष्चात्‌ स्थान पर या भ्रमणकाल में सर्वत्र वैष्णव सेवा भी मुख्यतया आपके यहॉं वृहद् रूप से हुआ करती थी। शरणागत जनों को जहॉं-जहॉं पंच संस्कारपूर्वक वैष्णवी दीक्षा देकर परमार्थ की ओर अग्रसर करते हुए भगवद्भक्ति का प्रचार करना ही आपका लक्ष्य था।
षिष्य परम्परा श्रीरसिकराजेष्वर महावाणीकार नित्यनिकुंजेष्वर युगलकिषोर श्रीष्यामाष्याम की नित्य विहारमयी लीलाआंें के उज्ज्वल रसोपासक प्रबल प्रतापी परम यषस्वी ख्यातनामा अनन्त श्रीविभूषित जगदगुरु निम्बार्काचार्य स्वामी श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज के मुख्यतया साढें बारह षिष्य थे। जिनमें वैष्णवी देवी भी सम्मिलित थी। इनमें आचार्य गद्दी आचार्यश्री के षिष्य परिकर में अपने कृपापात्र श्रीपरषुरामदेवाचार्यजी महाराज को दी। साथ ही अपनी निजी सेवा, पूवाचार्यों द्वारा परम्परागत श्रीसनकादि संसेव्य शालिग्राम स्वरूप ठाकुर श्रीसर्वेष्वर प्रभु (आराध्यदेव) की सेवा भी प्रदान की। तत्पष्चात्‌ अन्य षिष्यों ने भी अपने प्रखर वैदुष्य तथा तपस्या द्वारा भक्ति का प्रचार-प्रसार करते हुए जहॉं-तहॉं मठ, मन्दिर की संस्थापना की जो कि उनकी ‘‘द्वारा गादी‘‘ के नाम से प्रसिद्ध है। वे भी बड़े-बड़े विषाल मठ, मन्दिर हैं। इस प्रकार श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज एवं उनके षिष्य-प्रषिष्यों द्वारा भारत में सर्वत्र भावपूर्ण धर्म का बहुत सुन्दर प्रचार-प्रसार हुआ। श्रीस्वामी हाव्यासदेवाचार्यजी महाराज के साढ़ें बारह षिष्यों का नामोल्लेख अनन्त श्रीविभूषित जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्रीनारायणदेवाचार्यजी महाराज ने स्वनिर्मित ‘‘श्रीआचार्य चरितम्‌‘‘ नामक ग्रन्थ के 14 वें विश्राम के अन्त में श्लोक संख्या 43 के अन्त में किया हैं- वह इस प्रकार हैं--श्रीहरिव्यासदेवाचार्यचरण-चंचरीक श्रीपरषुरामदेवाचार्य, श्रीगोपालदेवाचार्य, श्रीमदनगोपालदेवाचार्य, श्रीबाहुबलदेवाचार्य, श्रीमोहितदेवाचार्य, श्रीकेषवदेवाचार्य, श्रीमाधवदेवाचार्य, श्रीउद्धव (घमंड) देवाचार्य, श्रीहृषीकेषदेवाचार्य, श्रीस्वभूरामदेवाचार्य, श्रीलपरागोपालदेवाचार्य और श्रीमुकुन्ददेवाचार्य इनके अलावा महाराज की परम षिष्या श्रीहरि भक्तिपरायण श्रीचण्डिका (श्रीदेवीजी) भी थी। यह देवी आजकल काष्मीर जम्बू के सन्निकट वैष्णवी देवी के नाम से प्रसिद्ध है। जहॉं जीव-हिंसात्मक बलि न होकर मिष्ठान्न भोग लगाया जाता हैं। इस प्रकार रसिकराजराजेष्वर जगद्गुरु निम्बार्काचार्य स्वामी श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज की ख्याति देष में सर्वत्र हो गई थी। आज भी सम्प्रदाय के लोग एवं सन्तजन जहॉं:तहॉं आपका हरिव्यासी के नाम से कहा करते हैं। आपका पाटोत्सव कार्तिक कृष्णा द्वादषी को मनाया जाता हैं। सखी-भाव की उपासना में आप ‘‘श्रीहरिप्रिया‘‘ सहचरी के नाम से प्रसिद्ध है। आपके द्वारा रचित ‘‘श्रीमहावाणी‘‘ के पदों में ‘‘श्रीहरिप्रिया‘‘ ष्षब्द का ही प्रयोग किया गया है। श्रीमहावाणी श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय की अमूल्य निधि हैं। इसमें आपने श्रीप्रिया-प्रियतम को नित्यनिकुंजोपासना में सखी भाव को ही मान्यता प्रदान की है, जैसे--
‘‘प्रात: कालहि ऊठिके, धार सखी को भाव। जाय मिले निज रूप में, याकौ यहै उपाव।।‘‘
36-जगदृगुरु निम्बार्काचार्य श्रीपरषुरामदेवाचार्यजी
अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ, परषुरामपुरी, निम्बार्कतीर्थ-सलेमाबाद के संस्थापक